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आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
गते सैन्यार्णवं भित्त्वा तरसा पाण्डवर्षभे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १४३
वैशम्पाय़न उवाच
गते ह्यम्भसि निम्नानि प्रादुर्भूते दिवाकरे ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
गतेन तेनास्मि कृतो विचेता; गात्रं च मे सम्परितप्यतीव |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
गतेन भूमिमभिकम्पय़ंस्तदा; विराटमासाद्य सभासमीपतः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
गतेषु च प्रभग्नेषु धार्तराष्ट्रेषु सर्वशः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
गतेषु तेषु नागेषु तापसच्छद्मरूपिषु |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
गतेषु तेषु रक्षःसु भीमसेनात्मजेऽपि च ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
गतेषु तेषु सर्वेषु तपस्विषु महात्मसु |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
गतेषु तेषु सर्वेषु सलिलस्थो महामुनिः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
व्यास उवाच
गतेषु त्रिदिवौकःसु व्रह्मैकः पर्यवस्थितः |
८० क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु सर्वेषु भरतर्षभ |
४५ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
गतेषु लोकपालेषु पार्थः शत्रुनिवर्हणः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
गतेषु वानरेन्द्रेषु गोपुच्छर्क्षेषु तेषु च |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
गतेऽर्जुने भृशं क्रुद्धं धर्मराजस्य निग्रहे ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
गतो दशरथः स्वर्गं वनस्थौ रामलक्ष्मणौ |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
गतो भद्रवटं रुद्रो निवृत्ताश्च दिवौकसः |
७८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
काक उवाच
गतो यथेप्सितं देशं हंसो मन इवाशुगः ||
५४ ख
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
गतो हि पक्षतां तेषां पार्षतः पुरुषर्षभः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
गतो ह्यरण्यादपि शक्रलोकं; धनञ्जय़ः पश्यत वीर्यमस्य |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
गतोत्सवं पुरमिव हृतनागमिव ह्रदम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
गतोदके सेतुवन्धो यादृक्तादृगय़ं तव |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
गतोऽभिमन्युः प्रथितां गतिं क्षत्रिय़पुङ्गवः ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
व्यास उवाच
गतोऽस्म्यङ्गिरसः पुत्रं देवाचार्यं वृहस्पतिम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
गतौ हि सैन्धवं वीरौ युय़ुधानवृकोदरौ |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
गत्या दशम्या ते गत्वा जघ्नुर्वाजिरथद्विपान् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
गत्या दशम्या संय़ुक्तानश्वत्थामा व्यवासृजत् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
गत्वा कर्णरथाभ्याशं विचलत्कुण्डलाननः |
६२ क
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा कुरूञ्शीघ्रमिमं महान्तं; पार्थाय़ शंसस्व वधं यदूनाम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ५९
वृहदश्व उवाच
गत्वा गत्वा नलो राजा पुनरेति सभां मुहुः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
गत्वा च तैः परिक्षिप्तं समन्तात्सर्वतोदिशम् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा च पितरं प्राहुः प्रणम्य शिरसा तदा |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
गत्वा च मम विश्वासं दत्त्वा च मम जीवितम् |
१२० क
वन पर्व
अध्याय १८३
मार्कण्डेय़ उवाच
गत्वा च यज्ञाय़तनमत्रिस्तुष्टाव तं नृपम् ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
गत्वा चैनमपश्यंस्ते किञ्चित्प्राणं नराधिपम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा चैव महावाहुर्नातिदूरं महाय़शाः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
गत्वा जहार त्वरितो नरमांसमपेतभीः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा तु तां भार्गवकर्मशालां; पार्थौ पृथां प्राप्य महानुभावौ |
१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
गत्वा तु तावका राजन्नातिदूरमवस्थिताः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
गत्वा तु योनिप्रभवानि दैत्य; सहस्रशः सिद्धिमुपैति जीवः ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा त्वं नर्तनागारं निर्जीवं कुरु पाण्डव ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा त्ववभृथं राजा विपाप्मा भ्रातृभिः सह |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
गत्वा देवर्षिगन्धर्वैः सहितोऽथ वृहस्पतिः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
गत्वा दौर्योधनं सैन्यं किं वै वक्ष्यथ मुख्यगाः ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
गत्वा नहुषमेकान्ते व्रवीहि तनुमध्यमे ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा नागपुरं वाच्यं पाण्डुः प्रव्रजितो वनम् ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
गत्वा पदशतं तूर्णं केशपक्षे परामृशत् ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
गत्वा पितामहं देवं प्रसाद्यैवं वचोऽव्रुवन् ||
९७ ख
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
गत्वा पुष्करमाहेदमेहि दीव्य नलेन वै ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमय़न्ती शुचिस्मिता |
१०६ क