आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तच्छ्रुत्वा रुरुदुः सर्वे समालिङ्ग्य परस्परम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं कृष्णः संन्यवर्तत भारत |
८८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं घोरं वासुदेवो महामनाः |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कर्णो राजानमव्रवीत् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य पुत्रो दुर्योधनस्तव |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य भीमस्यामितविक्रमः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सहिताः सर्वदेवताः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सुदेवस्य विशां पते |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भीमसेनोऽथ भीतवत् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भैमी वचनमव्रवीत् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्यास्तत्रैवावार्य दारकान् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं भीष्मः संमन्त्र्य सह मन्त्रिभिः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रः सुराणां शैलमभ्यगात् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
तच्छ्रुत्वा वचनं शक्रो विपुलस्य महात्मनः |
२७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वाक्यमशिवं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य कोपः समभवन्महान् ||
९२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथा चक्रुर्जनाधिप |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथ्यं वचनमुत्तमम् |
२४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य पुनरुक्तं वचोऽप्रिय़म् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वासुदेवोऽपि सव्यसाचिवचस्तदा |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा विदुरो धीमान्कलिद्वारमुपस्थितम् |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
कृप उवाच
तच्छ्रुत्वा विमनास्तत्र आचार्यो महदप्रिय़म् |
११७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा विविधं तस्य राजर्षेः परिदेवितम् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
तच्छ्रुत्वा विवुधा वाक्यं विस्मिता यत्नमास्थिताः |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वृत्रहा तेभ्यः स्वय़मेवान्ववेक्ष्य च |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वा वृष्णिवीरास्ते मदरक्तान्तलोचनाः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
तच्छ्रुत्वा व्यथिता लोकाः क इमामुद्धरेदिति ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
तच्छ्रुत्वा शासनं तस्य त्रिगर्तः प्रस्थलाधिपः |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
तच्छ्रुत्वा स मुनिस्तुष्टो विपुलस्य प्रतापवान् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
मन उवाच
तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमव्रवीत् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
घ्राण उवाच
तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमव्रवीत् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
जिह्वो उवाच
तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमव्रवीत् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
त्वगु उवाच
तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमव्रवीत् ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
श्रोत्र उवाच
तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमव्रवीत् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
चक्षुरु उवाच
तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमव्रवीत् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
तच्छ्रुत्वा सगरो राजा पुत्रजं दुःखमत्यजत् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
तच्छ्रुत्वा सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
सञ्जय़ उवाच
तच्छ्रुत्वा सूतपुत्रस्य वाक्यं सागरगासुतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
तच्छ्रुत्वा सृञ्जय़ो वाक्यं पर्वतस्य महात्मनः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
तच्छ्रुत्वा हृष्टमनसौ दिवं तौ प्रतिजग्मतुः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
तच्छ्रुत्वाङ्गिरसो वाक्यं जातवेदास्तथाकरोत् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतं नाम चास्याकरोत्तदा |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१२१
वैशम्पाय़न उवाच
तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतमन्तरिक्षस्थमव्रवीत् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
तच्छ्रोतुमहमिच्छामि त्वत्तः श्रेय़स्तपोधन ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
तज्जग्मतुरसम्भ्रान्तौ नरनाराय़णावृषी ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
तज्जग्राह पिता मह्यमव्रवीच्चैव स प्रभुः |
५० क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
तज्जस्तस्य विनाशाय़ यथाग्निररणिप्रजः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
तज्जानमानः कस्मात्त्वं कुरुषे नः प्रलोभनम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
तज्जीर्णमविकारेण सहान्नेन जनार्दन |
७३ क
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
तज्जुषस्वोत्तममते कथ्यमानं मय़ा द्विज |
३६ क