आदि पर्व
अध्याय
५६
जनमेजय़ उवाच
कथं सा द्रौपदी कृष्णा क्लिश्यमाना दुरात्मभिः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
कथं सात्यकिभीमाभ्यां व्यतिक्रान्तोऽसि मानद ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
जनमेजय़ उवाच
कथं सिद्धश्च भगवान्कश्चास्य निय़मोऽभवत् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
कथं सुनीतं तु भवेन्मन्त्रय़स्व वृहस्पते ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
युधिष्ठिर उवाच
कथं सृष्टानि भूतानि कथं वर्णविभक्तय़ः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भीष्म उवाच
कथं सृष्टानि भूतानि कथं वर्णविभक्तय़ः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वृहन्नडो उवाच
कथं सैरन्ध्रि मुक्तासि कथं पापाश्च ते हताः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
कथं स्यातां सुतौ वालौ भवेय़ं च कथं त्वहम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
कथं स्यादधिकः कश्चित्स तु भुञ्जीत मानवान् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
कथं स्यादवशेषं हि धुर्ययोरभ्यतीतय़ोः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
युधिष्ठिर उवाच
कथं स्वर्गे गतिः सर्प कर्मणां च फलं ध्रुवम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
कथं स्विदन्यथा व्रूय़ाद्वाक्यमेष महान्वसुः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
कथं स्विदिह राजेन्द्र पालय़न्पार्थिवः प्रजाः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
कथं स्विद्युधि कौन्तेय़ राज्यं न प्राप्नुय़ामहे ||
८५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८६
अष्टक उवाच
कथं स्विद्वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
कथं हत्वा गुरून्वृद्धान्विजय़ो नो भविष्यति ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
कथं हि त्वद्विधो मोहाद्रोचय़ेत पलाय़नम् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
कथं हि धर्मराजस्य दोषमल्पमपि व्रुवन् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
कथं हि नीचा इव दौष्कुलेय़ा; निर्धर्मार्थं कर्म कुर्युश्च पार्थाः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२५७
वैशम्पाय़न उवाच
कथं हि पत्नीमस्माकं धर्मज्ञां धर्मचारिणीम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
कथं हि पाण्डवः श्रीमान्सव्यसाची परन्तपः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
कथं हि पीत्वा माध्वीकं पीत्वा च मधुमाधवीम् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
कथं हि पुरुषो जातः क्षत्रिय़ेषु धनुर्धरः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
कथं हि भार्या पाण्डूनां पार्षतस्य स्वसा सती |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
कथं हि भिन्नकरटं पद्मिनं वनगोचरम् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
कथं हि भीमसेनं मां जानन्कश्चन माधव |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं हि भीमसेनस्य श्रोष्येऽहं शव्दमुत्तमम् |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
कथं हि भीष्मात्प्रथितः पृथिव्यां; भय़ं त्वमद्य प्रकरोषि वीर ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
कथं हि मन्त्राग्र्यधरो मनीषी; धर्मार्थय़ोरापदि सम्प्रणेता |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
कथं हि मादृशो लोके मुहूर्तमपि जीवति |
२५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
३
धृतराष्ट्र उवाच
कथं हि मानसैर्दुःखैः प्रमुच्यन्तेऽत्र पण्डिताः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
कथं हि युधि शक्येत विजेतुममरैरपि ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
कथं हि राजवंश्यस्त्वं कौरवेय़ो विशेषतः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
४७
जनमेजय़ उवाच
कथं हि राजा पुत्रं स्वमुपेक्षेताल्पचेतसम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
कथं हि राजा राज्यार्थी त्वय़ा गच्छेत संय़ुगम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
कथं हि राजा लोकस्य सर्वशास्त्रविशारदः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
युधिष्ठिर उवाच
कथं हि राजा वर्तेत यदि सर्वत्र नाश्वसेत् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
कथं हि वालस्तरुणो युद्धानामविशारदः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
कथं हि विधवानाथा वालपुत्रा विना त्वय़ा |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
कथं हि वृद्धमिथुनं हतपुत्रं भविष्यति |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
कथं हि शाखास्तिष्ठेय़ुश्छिन्नमूले वनस्पतौ ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
कथं हि शिरसो मध्ये पदं तेन कृतं मम |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
जनमेजय़ उवाच
कथं हि सर्वय़ज्ञेषु निश्चय़ः परमो भवेत् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
कथं हि स्त्री कर्मणोऽन्ते महीतला; त्समुत्तिष्ठेदन्यतो दैवय़ोगात् |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
कथं हि स्वजने भेदमुपेक्षेत महामतिः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१२
रुरुरु उवाच
कथं हिंसितवान्सर्पान्क्षत्रिय़ो जनमेजय़ः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
कथं हृष्येत जातेषु मृतेषु च कथं ज्वरेत् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
सञ्जय़ उवाच
कथं ह्यनिच्छमानस्य द्रोणस्य युधि फल्गुनः |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
कथं ह्यमर्त्यं व्रह्मंस्त्वं याजय़ित्वा सुराधिपम् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
३४
शिशुपाल उवाच
कथं ह्यराजा दाशार्हो मध्ये सर्वमहीक्षिताम् |
५ क