वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तामशिवां श्रुत्वा वाचं स परुषाक्षराम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तामेव चिक्षेप प्रतिविन्ध्याय़ भारत ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तामेव जग्राह प्रहसन्पाण्डुनन्दनः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तामेव शल्यस्य सौभद्रः परवीरहा |
७५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तामेव सङ्गृह्य शक्तिं कनकभूषणाम् |
५८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तालकेतुर्महाधर्मसेतु; र्महात्मा कृतात्मा महादाननित्यः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
ततस्तालध्वजः शूरः पाण्डवानामनीकिनीम् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तालध्वजो रामस्तय़ोर्युद्ध उपस्थिते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
ततस्तावसुरौ कृत्वा वेदान्समय़वन्धनान् |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तावागतौ शर्वः प्रोवाच प्रहसन्निव |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तावुद्यतगदौ गुरुपुत्रेण वारितौ |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
ततस्तिलोत्तमा तत्र वने पुष्पाणि चिन्वती |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तिष्येऽथ सम्प्राप्ते युगे कलिपुरस्कृते |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
ततस्तीक्ष्णाग्रदशनो वैडूर्यमणिलोचनः |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तीक्ष्णार्चिरभ्यागाज्ज्वलितो हव्यवाहनः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
ततस्तीरे समुद्रस्य कन्यातीर्थ उपस्पृशेत् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तीरे समुद्रस्य यत्र शिश्ये स पार्थिवः |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तीर्थवरं रामो यय़ौ वदरपाचनम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तीर्थेषु पुण्येषु गोमत्याः पाण्डवा नृप |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
ततस्तु कालसमय़े वभूवुस्तेऽथ पक्षिणः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१८४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु कुन्ती द्रुपदात्मजां ता; मुवाच काले वचनं वदान्या |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु कृतदारेभ्यः पाण्डुभ्यः प्राहिणोद्धरिः |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु क्रुद्धः सुवलस्य पुत्रो; माद्रीसुतं सहदेवं विमर्दे |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
ततस्तु क्षत्रिय़ाः केचिज्जमदग्निं निहत्य च |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
भीम उवाच
ततस्तु गत्वा पुरुषप्रवीरौ; राजानमासाद्य शय़ानमेकम् |
७० क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु चमसोद्भेदमच्युतस्त्वगमद्वली |
७८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु चेदिकारूषान्सृञ्जय़ांश्च महारथान् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
ततस्तु जिष्णुः परिहृत्य शेषां; श्चिच्छेद षड्भिर्निशितैः सुधारैः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तं वै द्विरदं महात्मा; प्रत्युद्ययौ त्वरमाणो जय़ाय़ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तत्सरो गत्वा सूर्यमण्डलसंनिभम् |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तस्मिंस्तुमुले समुत्थिते; सुदारुणे भारत मोहनीय़े |
८४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३४
वासुदेव उवाच
ततस्तु तस्या व्राह्मण्या मतिः क्षेत्रज्ञसङ्क्षय़े |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु तां समारोप्य निवध्य च सुमध्यमाम् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तावकं सैन्यं वध्यमानं समन्ततः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तावका राजन्परीप्सन्तोऽऽर्जुनिं रणे |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तावकाः शूरा नानाशस्त्रसमाय़ुताः |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तावकाः शूराः पुरस्कृत्य यतव्रतम् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तावकाः सर्वे परिवार्य सुतं तव |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तुमुलां वृष्टिं शस्त्राणां तिग्मतेजसाम् |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु तूर्णं समरे महारथौ; परस्परस्यान्तरमीक्षमाणौ |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु ते कौरवराजपुत्रा; विभूषिताः कुण्डलिनो युवानः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु ते क्रोधवशाः समेत्य; धनेश्वरं भीमवलप्रणुन्नाः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
४०
सूत उवाच
ततस्तु ते तद्गृहमग्निना वृतं; प्रदीप्यमानं विषजेन भोगिनः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
ततस्तु ते पूर्वजदेववाक्यं; श्रुत्वा देवा यत्र देवा यजन्ते |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु ते राजगणाः क्रमेण; कृष्णानिमित्तं नृप विक्रमन्तः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
ततस्तु तेजसस्तस्माज्जज्ञे लोकेषु तैजसम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु तेषां पुनरेव हर्षः; कैलासमालोक्य महान्वभूव |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
ततस्तु तेऽव्रुवन्वाक्यं व्राह्मणास्तां तपस्विनीम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
ततस्तु तैः शपथैः शप्यमानै; र्नानाविधैर्वहुभिः कौरवेन्द्र |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
ततस्तु तौ नवमभिवीक्ष्य यौवनं; परस्परं विगतजराविवामरौ |
६८ क