वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु वासांसि च राजपुत्र्या; धात्र्यश्च दास्यश्च विभूषणं च |
४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
४
विदुर उवाच
ततस्तु वाय़ुवेगेन ऊर्ध्वपादो ह्यधःशिराः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
ततस्तु वैतहव्यानां वधाय़ स महीपतिः |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु शक्तिं रुचिरोग्रदण्डां; मणिप्रवालोज्ज्वलितां प्रदीप्ताम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
ततस्तु शक्रो वरुणः कुवेरः; साध्या रुद्रा वसवश्चाश्विनौ च |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु शरवर्षेण पार्थिवास्तमवारय़न् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु शल्यो नवभिः पृषत्कै; र्भीमस्य राज्ञश्च युधिष्ठिरस्य |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु शिल्पिनः सर्वे अमात्यप्रवराश्च ह |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु शूराः समरे नरेन्द्रं; मद्रेश्वरं प्राप्य युधां वरिष्ठम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तु श्वश्रूश्वशुरावूचतुस्तां नृपात्मजाम् |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु संवृतो भीमस्तावकैर्निशितैः शरैः |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
ततस्तु सक्तुगन्धेन क्लेदेन सलिलस्य च |
८४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सत्वरं राजन्पाण्डुसैन्यमुपाद्रवत् ||
५५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु सभ्या विज्ञाय़ कृष्णां भूय़ोऽभ्यपूजय़न् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु समरे शूरः शकुनिः सौवलस्तदा |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु समरे शूरो वृष्णीनां प्रवरो रथी |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सशरं चापं नकुलस्य महात्मनः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सशरं चापं सात्वतस्य महात्मनः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
ततस्तु सस्वरं वाष्पमुत्सृजन्ती पुनः पुनः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सात्यकी राजन्द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सात्यकी राजन्पूजय़ामास पाण्डवम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सात्यकी राजन्सोमदत्तस्य संय़ुगे |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सात्यकेरर्थे भीमसेनो नवं दृढम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सात्वतस्यार्थे भैमसेनिर्नवं दृढम् |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सारथिर्ज्ञात्वा द्रोणपुत्रमचेतनम् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सिंहसेनस्य शिरः काय़ात्सकुण्डलम् |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सुरथोऽप्याजौ पाञ्चालानां महारथः |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सौवलो राजन्नभ्यतिक्रम्य पाण्डवान् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु स्वरसम्पन्ना वहवः सूतमागधाः |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२९
समुद्र उवाच
ततस्तु हतवीरासु क्षत्रिय़ासु पुनः पुनः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तु हतशिष्टा ये भीमसेनेन राक्षसाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तुतोष भगवान्हरिस्तेनास्य कर्मणा |
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तुमुलमाकाशमावृणोत्सदिवाकरम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
ततस्तुमुलमाकाशे शरवर्षमजाय़त |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तुमुलसङ्घाते वर्तमाने युगक्षय़े |
८५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
ततस्तुष्टोऽभवद्विप्रस्तस्य साधोर्महात्मनः ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
ततस्तूर्णं चित्रसेनो नाकुलिं नवभिः शरैः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तूर्यनिनादश्च भेरीणां च महास्वनः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तूर्यनिनादाश्च शङ्खानां च सहस्रशः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
ततस्तूर्यनिनादैश्च भेरीणां च महास्वनैः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तूर्यप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनाः |
५१ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तूर्यशताकीर्णं नटनर्तकसङ्कुलम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
ततस्तूर्यसहस्राणि नानालिङ्गानि भारत |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ततस्तूर्यसहस्राणि भेरीणामय़ुतानि च |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
ततस्तूर्यसहस्रेषु नदत्सु सुमहावलः |
१०८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तूष्णीं सर्वमासीद्गोविन्दगतमानसम् |
५३ क
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तृतीय़े दिवसे भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तृतीय़े दिवसे सत्यवत्याः सुतो मुनिः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
ततस्तृतीय़े दिवसे समे देशे व्यवस्थितः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततस्तृप्तेषु राजेन्द्र तेषु भूतेषु पञ्चसु |
२६ क