कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
हय़ांश्चतुर्भिश्चतुरस्त्रिभिर्ध्वजं; धनञ्जय़ो द्रौणिरथान्न्यपातय़त् ||
५९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्चास्य ततो जघ्ने सारथिं च न्यपातय़त् ||
११८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
हय़ांश्चास्य महाकाय़ान्महावेगपराक्रमान् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्चास्य शरैस्तीक्ष्णैः प्रेषय़ामास मृत्यवे |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्चास्य शितैर्वाणैः सारथिं च महावलः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्चास्यावधीद्राजन्नुभौ च पार्ष्णिसारथी ||
२२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
हय़ांश्चैव चतुःषष्ट्या शराणां जघ्निवान्वली |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
हय़ांश्चैषां गजांश्चैव सारथींश्चाप्यहं रणे |
२० क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
हय़ांस्तत्र विनिक्षिप्य सूतो रथवरं च तम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
हय़ांस्तानवमुच्याथ स्थापय़ामासतू रथम् ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
हय़ांस्तित्तिरिकल्माषाञ्शुकपत्रनिभानपि |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
हय़ाः काञ्चनय़ोक्त्राश्च केसरालम्विभिर्युगैः |
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
हय़ाः पञ्चशताः शिष्टाः शकुनेः सौवलस्य च |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
हय़ाः परिपतन्ति स्म शतशोऽथ सहस्रशः ||
४६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
हय़ाः परिपतन्ति स्म शतशोऽथ सहस्रशः ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
हय़ाः प्रजविताः शीघ्रा भारद्वाजरथोद्वहाः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
हय़ाः शुशुभिरे राजन्मेघा इव सविद्युतः ||
२२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
हय़ाः ससूताश्च हता नरेन्द्र; चूर्णीकृतश्चास्य रथः पतन्त्या |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
हय़ानन्ये समारुह्य गजानन्ये च भारत |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
हय़ानस्यार्जुनः सर्वान्कृतवानल्पजीवितान् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
सञ्जय़ उवाच
हय़ानां च गजानां च राज्ञां चामिततेजसाम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
हय़ानां च गजानां च शूराणां चामितौजसाम् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
हय़ानां च शतान्यत्र हत्वा पञ्च महारथान् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
हय़ानां चन्द्रशुभ्राणां गच्छ गालव माचिरम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
गालव उवाच
हय़ानां चन्द्रशुभ्राणां देशजानां वपुष्मताम् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
हय़ानां चन्द्रशुभ्राणां शतान्यष्टौ कुतो मम ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
हय़ानां नान्तरं ह्यासीत्पदाद्विचलितुं पदम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
हय़ानां वध्यमानानां गजानां रथिनां तथा |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
हय़ानां सादिभिः सार्धं पतितानां महीतले |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
हय़ानां हेषतां चैव रथानां च निवर्तताम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
हय़ानां हेषतां शव्दः कुञ्जराणां च वृंहताम् |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
हय़ानां हेषमाणानां योधानां तत्र गर्जताम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
हय़ानां हेषमाणानामनीकेषु सहस्रशः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
हय़ानामुत्तमाङ्गैश्च हस्तिहस्तैश्च मेदिनी |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
हय़ानास्तरणोपेतांश्चक्रुरन्ये सहस्रशः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
हय़ानीकेन महता सौवलश्चापि संवृतः |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
हय़ान्काञ्चनसंनाहान्भीमस्य न्यहनच्छरैः ||
१०१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
हय़ान्गजान्पदातांश्च रथांश्च तरसा वहून् |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
हय़ान्द्विपांस्त्वरय़न्तो योधा जग्मुः समन्ततः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
हय़ान्ध्वजं धनुर्मुष्टिमुभौ च पार्ष्णिसारथी |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
हय़ान्रथांश्च समरे शस्त्रैः शतसहस्रशः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
हय़ान्विमुच्य हि सुखं विशल्यान्कुरु माधव ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
हय़ान्सूतं रथं चैव निमेषाद्व्यधमच्छरैः ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
हय़ाभ्यां च गजाभ्यां च पदातिरथिनौ पुनः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
हय़ारोहवराश्चैव तव पुत्रेण चोदिताः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
हय़ारोहा गजस्थांश्च तदद्भुतमिवाभवत् ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
हय़ारोहा हय़ांस्त्यक्त्वा गजारोहाश्च दन्तिनः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
हय़ारोहा हय़ारोहान्रथिनश्चापि सादिनः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
हय़ारोहान्हय़ारोहाः प्रासशक्तिपरश्वधैः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
हय़ारोहैर्हय़ारोहाः पात्यन्ते स्म महाहवे |
१० क