chevron_left  तंarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
तं त्वं सात्वत सन्त्यज्य दस्युधर्मे कथं रतः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
तं त्वां देवासुरनरास्तत्त्वेन न विदुर्भवम् |
३९ क
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
तं त्वामेवंविधं ज्ञात्वा स्वय़ं वै पाकशासनः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
तं त्वामय़शसा स्पृष्टं न व्रूय़ां यदि सञ्जय़ |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
तं दग्ध्वा स नगं नागः काश्यपं पुनरव्रवीत् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
तं दण्डनीतिः सकला श्रिता राजन्नरोत्तमम् |
१०६ क
आदि पर्व
अध्याय ६
सूत उवाच
तं ददर्श पिता तत्र च्यवनं तां च भामिनीम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
तं ददर्श प्रिय़ा भार्या भैक्ष्यवृत्तिमकिञ्चनम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय १३५
लोमश उवाच
तं ददर्श यवक्रीस्तु यत्नवन्तं निवन्धने |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
तं ददर्श स नागेन्द्रस्तक्षकः काश्यपं पथि |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
तं ददर्शाथ नागेन्द्रः काश्यपं तक्षकस्तदा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
तं ददर्शाश्रमपदे नारदः सुमहातपाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
तं ददौ सूर्यपुत्रस्तु मनुर्वै रक्षणात्मकम् ||
३९ ग
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण करिष्येऽहमपज्वरम् |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
काश्यप उवाच
तं दष्टं पन्नगेन्द्रेण तेनाग्निसमतेजसा |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
तं दस्युग्राममगमद्यत्रासौ गौतमोऽभवत् ||
३९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
तं दहन्तमनीकानि क्रुद्धमग्निं यथा वनम् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तं दहन्तमनीकानि तत्र तत्र महारथम् |
११८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तं दहन्तमनीकानि द्रोणपुत्रः प्रतापवान् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
तं दहन्तमनीकानि रथोदारं कृतान्तवत् |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
तं दावं समुदीक्षन्तः कृष्णौ चाभ्युद्यताय़ुधौ |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तं दाशः प्रतिजग्राह विधिवत्प्रतिपूज्य च |
६८ क
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
तं दिधक्षुर्न शक्नोमि दग्धुं शक्रस्य तेजसा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
तं दीनमनसं वीरमधोवदनमातुरम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
तं दीप्तमिव कालाग्निं दण्डहस्तमिवान्तकम् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
तं दीप्तमिव कालाग्निं पाशहस्तमिवान्तकम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
तं दीप्तमिव कालाग्निमाकाशगमिवाध्वगम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
तं दीर्णमनुदीर्यन्ते योधाः शूरतमा अपि ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय १४
कृष्ण उवाच
तं दुर्वलतरो राजा कथं पार्थ उपैष्यति ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
तं दृष्ट्वा कुञ्जरं मत्तमाय़ान्तं मदगर्वितम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा कुरवस्त्रस्ताः प्रहृष्टाश्चाभवन्पुनः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
तं दृष्ट्वा क्रूरमाय़ान्तं जीवितार्थी नराधिप |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा क्लीववेषेण रथस्थं नरपुङ्गवम् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा क्षत्रिय़ाः शूराः प्रतपन्तं शरार्चिभिः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
भीष्म उवाच
तं दृष्ट्वा गौतमः प्रीतो मुनिकान्तमनुत्तमम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा घोरमात्मानं केशवस्य महात्मनः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १२५
लोमश उवाच
तं दृष्ट्वा घोरवदनं मदं देवः शतक्रतुः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
तं दृष्ट्वा च सुसूक्ष्मेण रूपेणावस्थितं प्रभुम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा चाप्लुतं तोय़े सागरे सागरोपमम् |
२१ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा चार्जुनोऽगच्छद्वासुदेवस्य पृष्ठतः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा छिन्नधन्वानं शतानीकः सहोदरम् |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
तं दृष्ट्वा जीवितं वृक्षं काश्यपेन महात्मना |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
तं दृष्ट्वा जीवय़ामास सानुक्रोशो धृतव्रतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा तत्र कौन्तेय़ं प्रगृहीतशरासनम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
तं दृष्ट्वा तस्य दुर्वुद्धेरविन्ध्यः पापनिश्चय़म् |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा तावका राजन्रथपत्तिसमन्विताः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा तु तथाय़ान्तं शूरो राजा श्रुताय़ुधः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा तु शरं घोरं देवगन्धर्वमानवाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
तं दृष्ट्वा दानवेन्द्रौ तौ महाहासममुञ्चताम् ||
५९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा दीनमनसं गतसत्त्वं जनेश्वरम् |
५ क