अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
न गोदानात्परं किञ्चिद्विद्यते वसुधाधिप |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
न गोभ्यः परमं किञ्चित्पवित्रं पुरुषर्षभ ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
न गोष्ठ्या नोपचारेण न च वन्धुनिमित्ततः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
न गोष्ठ्या नोपचारेण न सम्वन्धनिमित्ततः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
न ग्राम्यधर्मेषु रतिस्तवास्ति; कामान्न किञ्चित्कुरुषे नरेन्द्र |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
न ग्राम्यमुपय़ुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
न ग्लानिर्न च कातर्यं न वैक्लव्यं न मत्सरः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
न ग्लाय़ते च हृदय़ं न च ते व्याकुलं मनः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
न घातय़ति नो हन्ति घ्नन्तं नैवानुमोदते |
५५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
न घातय़िष्यामि रणे मित्राणीमानि केशव ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
न घातय़ेय़ुः प्रदरं कुर्वाणास्तुमुले सति ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
मन उवाच
न घ्राति मामृते घ्राणं रसं जिह्वा न वुध्यते |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
न घ्रेय़श्चैव गन्धेन रसेन च विवर्जितः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
न च कर्णं रणे शक्ता जेतुमन्ये महारथाः |
८२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
न च कर्णसमं योधं लोके पश्यामि कञ्चन |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
न च कर्मसु तद्धीनः शिष्यवुद्धिर्नरो यथा |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न च कश्चिन्न तान्हन्ति किमन्यत्प्राणय़ापनात् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न च कामसमाय़ुक्ते मुक्तेऽप्यस्ति त्रिदण्डकम् |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
न च कामाद्भय़ात्क्रोधाल्लोभाद्वा धर्ममुत्सृजेत् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
न च कामान्न संरम्भान्न द्वेषाद्धर्ममुत्सृजेत् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
न च कामान्न संरम्भान्न द्वेषाद्धर्ममुत्सृजेत् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
न च कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हति |
८६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
न च काय़ेन कृतवान्स पापं परमण्वपि ||
२५ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
न च किञ्चन जानाति सोऽपि धर्मार्थनिश्चय़म् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
न च किञ्चित्तदोचुस्ते ह्रिय़ा सन्तो युधिष्ठिरम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
न च किञ्चिदुवाचैनं शुभं वा यदि वाशुभम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
न च किञ्चिदुवाचैनं स मुनिः पृच्छतोऽपि सन् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
सावित्र्यु उवाच
न च किञ्चिद्रहस्यं मे श्रूय़तां तथ्यमत्र यत् ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
न च कुप्यन्ति भृत्येभ्यो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
न च केन च धर्मेण विरुध्यन्ते प्रजा इमाः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
न च क्वचिदविन्दत्स भिक्षमाणोऽपि कौशिकः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
न च क्षरति तेभ्यः स शश्वच्चैवाप्नुते महत् |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
न च क्षान्तेन ते भाव्यं नित्यं पुरुषसत्तम |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
न च गा न च ते देशान्न यज्ञाञ्श्रूय़तामिदम् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
उत्तङ्क उवाच
न च गुर्वर्थमुद्युक्तं हिंस्यमाहुर्मनीषिणः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
न च गृह्णाति तन्मन्दः पुत्रो दुर्योधनो मम ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
न च ग्रन्थार्थतत्त्वज्ञस्तस्य तद्धारणं वृथा ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
न च जज्ञुरनीकानि दिशो वा प्रदिशस्तथा ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
न च जातूपतप्यन्ते धीराः परसमृद्धिभिः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
न च जातूपतप्यन्ते धीराः परसमृद्धिभिः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
न च जानाति वीभत्सुस्तदस्त्रं न जनार्दनः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
१०१
देवा ऊचुः
न च जानीम केनेमे रात्रौ वध्यन्ति व्राह्मणाः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
न च जीवं विना व्रह्मन्धातवश्चेष्टय़न्त्युत ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
न च ज्ञास्यसि पन्थानं तमसा संवृते वने ||
७८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
न च तं कृष्ण पश्यामि क्षत्रधर्ममनुष्ठितम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
न च तं पर्वतः किञ्चिदुवाचेन्द्रव्यपेक्षय़ा ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
न च तं भागिनेय़ाय़ पर्वताय़ महात्मने |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
जनमेजय़ उवाच
न च तं लव्धवान्कामं ततो युद्धमभूदिदम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
न च तं लव्धवान्कामं दुरात्मा शासनातिगः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
न च तं हातुमिच्छामः समय़ं राजसत्तम ||
२४ ख