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द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्रासो महानासीत्कुरुपाण्डवसेनय़ोः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २९
भीष्म उवाच
ततस्त्रिंशद्गुणे काले लभते वैश्यतामपि |
८ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्रिगर्तः सधनुरवतीर्य महारथात् |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्रिगर्तराजानं सूर्यवर्माणमाहवे |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्रिगर्तराट्क्रुद्धस्तानुवाच महारथान् |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्रिगर्ता राजेन्द्र मद्राश्च सह केकय़ैः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्रिगर्तान्कौन्तेय़ो दार्वान्कोकनदाश्च ये |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्रितो महाराज भागांस्तेषां यथाविधि |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्रिभिश्च त्रिदशाधिपोपमं; शरैर्विभेदाधिरथिर्धनञ्जय़म् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
ततस्त्रिलोककृद्देवः पुनरेव महातपाः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्रेताय़ुगं नाम त्रय़ी यत्र भविष्यति |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
ततस्त्रैगुण्यहीनास्ते परमात्मानमञ्जसा |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
ततस्त्रैलोक्यमृषय़ो व्यचिन्वन्त सुरैः सह |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्र्यङ्गेण महता वलेन भरतर्षभ |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्रय़ोदशस्यान्ते तस्य वर्षस्य भारत |
३ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्रय़ोदशे वर्षे निवृत्ते पञ्च पाण्डवाः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र प्रकरिष्यसि संय़ुगम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
ततस्त्वं पुरुषव्याघ्र विजय़ाय़ाभिषेचितः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ४५
सूत उवाच
ततस्त्वं पुरुषश्रेष्ठ धर्मेण प्रतिपेदिवान् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्वं भ्रातृभिः सार्धं परमासिमवाप्तवान् ||
७९ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
वासुदेव उवाच
ततस्त्वं सम्यगाचीर्णे धर्मेऽस्मिन्कुरुनन्दन |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
ततस्त्वं सर्वभूतानां धर्मं वेत्स्यसि वै परम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वं हास्तिनपुरे भ्रातृभिः सहितो वसन् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्वजीजनत्कृष्णा नक्षत्रे वह्निदैवते |
७८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वदीय़ाः संहृष्टाः साधु साध्विति चुक्रुशुः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वदीय़ाश्च परे च साय़कैः; कृतेऽन्धकारे विविदुर्न किञ्चन |
६ क
वन पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्वध्यापय़ामास सरहस्य निवर्तनम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
ततस्त्वभिभवाद्भीतो वृहस्पतिमते स्थितः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वभ्यवसृत्यैव सङ्ग्रामादुत्तरां दिशम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५
इन्द्राण्यु उवाच
ततस्त्वमेव भर्ता मे भविष्यसि सुराधिप ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वरन्पुनर्द्रोणो धनुर्हस्तो व्यतिष्ठत |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्वरित उत्थाय़ पादौ मूर्ध्ना प्रणम्य च |
६७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वरितमागत्य कृतवर्मा तवात्मजम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वरितमारुह्य सहदेवरथं नृपः |
४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६५
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्वरितमाय़ान्तीं ददर्श स्वां पितृष्वसाम् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्ववभृथस्नातं धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
ततस्त्वस्त्राणि दिव्यानि जामदग्न्यः प्रतापवान् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
ततस्त्वहं तं शनकैरवोचं; वृतं सदस्यैरभिपूज्यमानम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
ततस्त्वां व्राह्मणो विद्वान्पर्णादो नाम पार्थिव |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्वादाय़ दारूणि गन्धांश्च विविधान्वहून् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वापततस्तस्य तव पुत्रो जनाधिप |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
ततस्त्वार्ताः प्रय़ाचामस्त्वां वरं वरदो ह्यसि ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
ततस्त्वाश्रममागम्य स पावकसुतस्तदा |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वाहं न हन्म्यद्य द्रोणे जीवति संय़ुगे ||
३० ग
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्वैरावतं नागं जज्ञे भद्रमना सुतम् |
६१ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
ततस्त्वौशनसं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
११६ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्वय़ा प्राप्तमिदं मुहूर्तं दुःखमुत्तमम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
ततस्त्वय़ैवं कार्यं स्यान्न तु कार्यं मय़ि स्थिते ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तय़ोः शरीरे ते दृष्ट्वा मोहवशं गता |
२३ क