आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
जरितारौ कुलं हीदं ज्येष्ठत्वेन प्रतिष्ठितम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
जरेति क्षय़माहुर्वै दारुणं कारुसञ्ज्ञितम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
उत्तङ्क उवाच
जरेय़ं नाववुद्धा मे नाभिज्ञातं सुखं च मे |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
जरोग्रामुपय़ुक्तार्थां जीर्णां कूपमिवाजलम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
जर्जरं चास्य विषय़ं कुर्वन्ति प्रतिरूपकैः |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
जर्जरीकृतसर्वाङ्गौ रुधिरेणाभिसम्प्लुतौ |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
जर्तिका नाम वाह्लीकास्तेषां वृत्तं सुनिन्दितम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
जरय़ा च परिद्यूनो व्याधिना च प्रपीडितः |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
जरय़ा सन्धितो यस्माज्जरासन्धस्ततोऽभवत् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
जरय़ा हि परीतस्य मृत्युना वा विनाशिना |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
जरय़ाभिपरीतेन शत्रुभिर्व्यंसितेन च ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
जरय़ामास तद्वीरः सहान्नेन वृकोदरः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
जरय़ाहं प्रतिच्छन्नो वय़ोरूपधरस्तव |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
जरय़िष्यथ चाप्यन्नं मय़ा सार्धं न संशय़ः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
जलं दिवं खं क्षितिं चन्द्रसूर्यौ; तथा वाय़्वग्नी प्रतिमानं जगच्च |
६१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
जलं दृष्ट्वा प्रधावन्ति क्रोशमानाः परस्परम् |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
जलं निस्रावय़ेत्सर्वमनिस्राव्यं च दूषय़ेत् ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
जलं पीत्वा मृतान्पश्य पिवतोऽन्यांश्च भारत ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
जलं प्रतरमाणश्च कीर्तय़ेत पितामहान् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
जलं स्पृशसि पक्षाभ्यां तुण्डेन च पुनः पुनः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
जलकर्दमलिप्ताङ्गो लोककार्यार्थमुद्यतः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
जलजं पाञ्चजन्यं वै प्राणेनाहमपूरय़म् ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
जलजानां च माल्यानां स्थलजानां च सर्वशः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
जलजानामपि ह्यन्तं पर्याय़ेणोपलक्षय़े |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
जलजानि च माल्यानि पद्मादीनि च यानि च |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
जलजानि च सत्त्वानि दह्यमानानि भारत |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
जलदनिनदनिस्वनं रथं; पवनविधूतपताककेतनम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
जलदाभांस्तथा शैलांस्तोय़प्रस्रवणान्वितान् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
जलधारात्परो राजन्सुकुमार इति स्मृतः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
जलधाराश्च ताः शोषं जग्मुर्नेशुश्च विद्युतः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
जलप्रदानिकं पर्व स्त्रीपर्व च ततः परम् ||
६१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
जलमग्निस्तथा वाय़ुरथ वापि विकर्शनम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
जलमेतन्निपतितं मम पाणौ द्विजोत्तम |
११३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
जलरूपमिवाकाशे तत्रैवात्मनि पश्यति ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
जलवांस्तृणवान्मार्गः समो गम्यः प्रशस्यते |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
जलवाहास्तथा मेघा वाय़वः स्तनय़ित्नवः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
जलविन्दुर्यथा लोलः पद्मिनीपत्रसंस्थितः |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
जलविन्दुर्यथा लोलः पर्णस्थः सर्वतश्चलः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
जलसन्धं निहत्याजौ त्वरमाणस्तु सात्वतः |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
जलसन्धं महावाहुर्भीमसेनो न्यवारय़त् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
जलसन्धं महावीर्यं भगदत्तं च पार्थिवम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
जलसन्धं महेष्वासं पश्य सात्यकिना हतम् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
जलसन्धं विनिर्भिद्य सोऽनय़द्यमसादनम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
जलसन्धं हतं दृष्ट्वा वृष्णीनामृषभेण ह ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
जलसन्धः पितापुत्रौ सुदण्डो दण्ड एव च ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
जलसन्धमहाग्राहं कर्णचन्द्रोदय़ोद्धतम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
जलसन्धवलेनाजौ पुरुषादैरिवावृतम् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
जलसन्धस्तु तत्त्यक्त्वा सशरं वै शरासनम् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
जलसन्धस्य चिच्छेद विव्याध च त्रिभिः शरैः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
जलसन्धार्णवं तीर्त्वा काम्वोजानां च वाहिनीम् ||
८ ख