उद्योग पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यमर्थ्यं स धर्मात्मा ध्रुवं वक्ता जनार्दनः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
भगवानु उवाच
धर्म्यमस्मद्धितं चैव कुरूणां यदनामय़म् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
धर्म्यमाकाङ्क्षता लाभमीश्वरस्यानसूय़ता ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
युधिष्ठिर उवाच
धर्म्यमालम्व्य पन्थानं विजय़ेय़ं कथं महीम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यां रतिं सेवमाना धर्मार्थावभिपेदिरे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
धर्म्याः पापानि कुर्वन्तो गच्छन्ति परमां गतिम् ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
धर्म्याः स्त्रिय़ः सभां पूर्वं न नय़न्तीति नः श्रुतम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्याणि रमणीय़ानि प्रेक्षमाणो यय़ौ प्रभुः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेय़ोऽन्यत्क्षत्रिय़स्य न विद्यते ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यान्दारान्परित्यज्य यस्त्वमिच्छसि जीवितुम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
धर्म्यान्मार्गान्न च्यवन्ते यथा नस्त्वं वधूः स्थिता ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
धर्म्ये धर्मात्मना युद्धे निहतो धर्मसूनुना |
५५ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यैर्धनागमैस्तस्य ववृधे निचय़ो महान् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
धर्मय़ानं समारूढौ पर्वते गन्धमादने ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
धर्मय़ुक्तमधर्मं च तत्र किं प्रतिभाति ते ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
धर्मय़ुक्तस्ततो लोकान्पुण्यानाप्स्यसि शाश्वतान् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मय़ुक्तस्य धर्मात्मन्पितुरासीत्तरी मम |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
धर्मय़ुक्ता द्विजाः श्रेष्ठा वेदय़ुक्ता भवन्ति च |
३६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
धर्मय़ुक्तानि कार्याणि व्यवहारान्वितानि च |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
धर्मय़ुद्धमय़ुध्यन्त प्रेक्षन्तो गतिमुत्तमाम् ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
धर्मय़ुद्धे ह्यधर्मेण समाहूय़ौजसा मृधे |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
धर्षणां कृतवानेतां पश्यतस्ते धनेश्वर |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नाग उवाच
धर्षणाद्रोषसंविग्नाः कार्तवीर्यसुता हताः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
धर्षणामात्मनः पश्यन्वाहुद्रविणमाश्रितः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
धर्षणीय़ो रिपूणां स्याद्भुजङ्ग इव निर्विषः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
धर्षिताः काममन्युभ्यां क्रोधलोभवशानुगाः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
हनूमानु उवाच
धर्षय़ेद्वा शपेद्वापि मा कश्चिदिति भारत ||
४० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
धवककुभकदम्वनारिकेलैः; कुरवककेतकजम्वुपाटलाभिः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
धातवः पञ्चशाखोऽय़ं खं वाय़ुर्ज्योतिरम्वु भूः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
धातवो जातरूपस्य रश्मय़ः सवितुर्यथा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
धातवो हरितालस्य क्वचिद्धिङ्गुलकस्य च ||
८० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
धाता चैव विधाता च तथा चैवानिलानलौ ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
धाता त्वं सर्वभूतानां त्वं प्रभुर्जगतो गुरुः |
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
धाता त्वष्टा विधाता च त्वं प्रभुः सर्वतोमुखः ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणश्चांश एव च |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
धाता यथा मां विदधाति लोके; ध्रुवं तथाहं भवितेति मत्वा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
धाता विधाता लोकेशो दिशश्च सदिगीश्वराः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
धाता शक्रश्च विष्णुश्च मित्रस्त्वष्टा ध्रुवो धरः ||
१०१ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
धातापि हि स्वकर्मैव तैस्तैर्हेतुभिरीश्वरः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
धातारं गर्हते नित्यं लव्धार्थांश्च न मृष्यते ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
धातारं गर्हय़े पार्थ विषमं योऽनुपश्यति ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
धातारमजरं नित्यं तमाहुः परमव्ययम् ||
८६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोंऽशो भगस्तथा |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
धातार्यमा शुक्रवृहस्पती च; रुद्राः ससाध्या वरुणो वित्तगोपः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
धातासृजत्पुत्रमेकं प्रजानां धारणे रतम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
धातुः पितॄणां च तथा महात्मा; रुद्रस्य राजन्सगणस्य चैव ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
धातुक्षय़प्रशान्तात्मा निर्द्वन्द्वः स विमुच्यते ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
धातुप्रस्यन्दिनः शैलाद्यथा गैरिकराजय़ः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
धातुभिश्च सरिद्भिश्च किंनरैर्मृगपक्षिभिः |
८६ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
धातुरादेशमन्वेति तन्मय़ो हि तदर्पणः ||
२५ ख