आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जग्मुर्महात्मानः सर्व एव दिवौकसः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
ततो जग्राह देवेन्द्रं वृत्रो वीरः शतक्रतुम् |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
ततो जग्राह धर्मे स स्थितिमिन्द्रनिभो नृपः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
ततो जग्राह पञ्चाङ्गीं जीवितार्थी महामुनिः |
८९ क
सभा पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जग्राह शकुनिस्तानक्षानक्षतत्त्ववित् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ततो जघान सङ्क्रुद्धो वासविस्तां महाचमूम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
ततो जघान समरे वृत्रं देवपतिः स्वय़म् |
६५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
ततो जघ्नुर्महाभेरीः शतशश्चैव पुष्करान् |
१०४ क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जज्ञे मांसपेशी लोहाष्ठीलेव संहता |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
ततो जनक्षय़ं कृत्वा पाण्डवानां महात्ययम् |
१४८ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जनपदं प्राप्य कृष्णा राजानमव्रवीत् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
ततो जनसहस्राणि वाष्पपूर्णानि मारिष |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
ततो जनार्दनः प्राय़ाद्द्रष्टुमिच्छन्युधिष्ठिरम् |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
ततो जनार्दनः सङ्ख्ये प्रिय़ं पुरुषसत्तमम् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जलधरश्यामो वरुणो यादसां पतिः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो जलधराः सर्वे व्याप्नुवन्ति नभस्तलम् ||
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जलविहारार्थं कारय़ामास भारत |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जलात्समुत्तीर्य कन्यास्ताः सहितास्तदा |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जवेन महता गोपाः पुरमथाव्रजत् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जवेन महता तूर्णमश्वानचोदय़त् ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
ततो जवेनाभिससार रोषा; द्दुःशासनस्तामभिगर्जमानः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
ततो जाजलिना तेन समाहूताः पतत्रिणः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
ततो जाताभिसंरम्भौ परस्परवधैषिणौ |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जानपदाः सर्वे आजग्मुर्नगरं प्रति |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
ततो जाम्वूनदाः पात्रीर्वज्राङ्का विमलाः शुभाः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जाम्वूनदाङ्गानि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
ततो जालं वाणमय़ं विवृत्य; सन्दृश्य भित्त्वा शरजालेन राजन् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जालपदीं नाम देवकन्यां सुरेश्वरः |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जिगमिषन्तस्ते वृष्ण्यन्धकमहारथाः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८४
भीष्म उवाच
ततो जित्वा त्वमेवैनं पुनरुत्थापय़िष्यसि |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
ततो जित्वा महीं कृत्स्नां रामो राजीवलोचनः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
ततो जिष्णुः सहस्राक्षं खं वितत्येषुभिः शितैः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
ततो जीमूतसङ्काशान्नागादिन्द्र इवाभिभूः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
ततो जेष्यसि सङ्ग्रामे धार्तराष्ट्रान्समागतान् ||
८२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
ततो जैत्रं रथवरं गन्धर्वनगरोपमम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
९६
लोमश उवाच
ततो ज्ञात्वा समादत्तां यदत्र व्यतिरिच्यते ||
१० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो ज्ञात्वा हतामित्रं धर्मराजं युधिष्ठिरम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो ज्ञास्यसि कः कस्य केन वा कथमेव वा ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
ततो ज्ञास्यसि तत्त्वेन मद्वीर्यवलपौरुषम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
ततो ज्ञास्यसि मां सौते प्रज्ञाचक्षुषमित्युत ||
१०१ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
ततो ज्यातलनिर्घोषः पुनरासीद्विशां पते |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
ततो ज्यामनुमृज्याशु व्याक्षिपद्गाण्डिवं धनुः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
ततो ज्यामवधाय़ान्यामनुमृज्य च पाण्डवः |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो ज्येष्ठे तु दौहित्रे प्रादाद्दक्षो नृपोत्तम |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
ततो ज्येष्ठो जामदग्न्यो रुमण्वान्नाम नामतः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततो ज्वलनमादाय़ हुत्वा सर्वे पृथक्पृथक् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
ततो जय़न्त्या राजेन्द्र सोमतीर्थं समाविशेत् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
ततो जय़ो महाराज कृतवर्मा च सात्त्वतः |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो दक्षिणमल्लांश्च भोगवन्तं च पाण्डवः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो दक्षिणमागम्य पुलिन्दनगरं महत् |
१० क