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शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवनिकाय़ास्ते भूतसेनागणास्तथा |
५० क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ततो देवपथं गच्छेन्निय़तो निय़ताशनः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
ततो देवर्षिगन्धर्वा विस्मय़ं परमं गताः |
३ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो देवर्षिसहितः सरितं गोमतीमनु |
६९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवर्षय़ः सर्वे तथा सप्तर्षय़ोऽपि च |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
ततो देवर्षय़ः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षय़ः |
१ क
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
ततो देवर्षय़श्चैव दानवर्षिगणाश्च ये |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवव्रतो वृद्धैः क्षत्रिय़ैः सहितस्तदा |
६७ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
ततो देवह्रदे रम्ये कृष्णवेण्णाजलोद्भवे |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७
शल्य उवाच
ततो देवा भृशं तुष्टा महर्षिगणसंवृताः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
ततो देवा महात्मान ईजिरे यज्ञमच्युत |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवा मानवा दानवाश्च; निकृन्तन्तं कर्णमात्मानमेवम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
ततो देवा वरं तस्मै ददुरग्निपुरोगमाः |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
ततो देवाः क्रिय़ावन्तो दानवानभ्यधर्षय़न् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
ततो देवाः प्रिय़ाण्यस्य सर्व एव समाचरन् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
ततो देवाः सगन्धर्वा मुनय़ोऽप्सरसोऽपि च |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
ततो देवाः सगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः |
४० क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवाः सगन्धर्वाः समादाय़ार्घ्यमुत्तमम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षय़ः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
सिद्धा ऊचुः
ततो देवाः समागम्य वृहस्पतिपुरोगमाः |
६२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवाः समागम्य सोममूचुर्महीपते |
६० क
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
ततो देवाः समेतास्ते तदोचुर्मधुसूदनम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वासुदेव उवाच
ततो देवाः समेत्याथ व्रह्माणमिदमव्रुवन् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
ततो देवाः सर्व एव तेन घोषेण वोधितः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
ततो देवाः सहिताः सर्व एव; सेन्द्राः समागम्य महाद्रिराजम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
ततो देवातिदेवस्तं व्रह्मा समुपसर्पत ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
ततो देवादिदेवः स योगात्मा योगसारथिः |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
ततो देवानगमद्धूमकेतु; र्दाहाद्भीतो व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
ततो देवानसुरान्मानुषांश्च; लोकानृषींश्चाथ पितॄन्प्रजाश्च |
४० क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो देवान्नमस्कृत्य सुहृद्भिरभिनन्दितः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
ततो देवाभवन्भीता उग्रं दृष्ट्वा तय़ोस्तपः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
ततो देवास्त्रय़स्त्रिंशद्दिशश्च सदिगीश्वराः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
ततो देवैः सहितो देवराजो; रथे युक्त्वा तान्हरीन्वाजिमुख्यान् |
१९ क
मौसल पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवैरृषिभिश्चापि कृष्णः; समागतश्चारणैश्चैव राजन् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
ततो देवैर्महादेवस्तदा पशुपतिः कृतः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
ततो देवो गिरिशो वज्रपाणिं; विवृत्य नेत्रे कुपितोऽभ्युवाच |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवो महादेवः शूलपाणिर्भगाक्षिहा |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव ह |
३७ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
ततो देवो विशुद्धात्मा विमानेन चतुर्मुखः |
१७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
ततो देवय़ुगेऽतीते देवा वै समकल्पय़न् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देशे समे स्निग्धे प्रभूतय़वसेन्धने |
६७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो देशेषु देशेषु रमणीय़ेषु भागशः |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो दैत्या विनिष्पेतुः शतशोऽथ सहस्रशः |
७८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
ततो दौःशासनिं कार्ष्णिर्विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
ततो दौःशासनिः क्रुद्धो गदामुद्यम्य मारिष |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
ततो दौःशासनिः क्षिप्रं तथा तैर्विरथीकृतम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
ततो दौर्योधनं सैन्यं मुदा परमय़ा युतम् |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
ततो द्युतिमतां मध्ये पाण्डवानां महात्मनाम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
ततो द्रक्ष्यसि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ||
१८ ग
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
ततो द्रष्टासि समरे यत्करिष्यामि भारत |
५८ क