वन पर्व
अध्याय
२६०
अग्निरु उवाच
ततो नस्त्रातु भगवन्नान्यस्त्राता हि विद्यते ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
ततो नागच्छति चिरगतश्चेति ||
५३ घ
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ततो नागस्य तद्वर्म व्यधमत्पाकशासनिः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततो नागा रथाश्चैव सादिनश्च विशां पते |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
अर्जुन उवाच
ततो नाज्ञापय़ामि त्वां प्रीतिपूर्वं प्रदीय़ताम् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
ततो नाज्ञासिषं किञ्चिद्घोरेण तमसावृते |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
ततो नाज्ञाय़त तदा दिवारात्रं तथा दिशः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
३५
सूत उवाच
ततो नातिमहान्कालः समतीत इवाभवत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
ततो नादः समभवत्पुनरेव समन्ततः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
ततो नादः समभवद्दिक्षु सर्वासु भारत |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
ततो नादः समभवद्वादित्राणां च निस्वनः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
ततो नादृश्यत तदा सौभं कुरुकुलोद्वह |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
ततो नानाप्रहरणैरन्योन्यमभिवर्षताम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
ततो नानाविधास्तत्र सुस्रुवुः सागराम्भसि |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
ततो नाम स कन्याय़ाः पप्रच्छ भृगुनन्दन |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो नाराय़णं तेजो व्रतचर्येन्धनोत्थितम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
ततो नाराय़णं देवं व्रह्मा वचनमव्रवीत् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
ततो नाराय़णसुहृन्नारदो भगवानृषिः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
ततो नाराय़णास्त्रं तत्प्रशान्तं शत्रुतापनम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
ततो नाराय़णो दृष्ट्वा तानृषीन्विस्मय़ान्वितान् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
ततो नाराय़णो दृष्ट्वा ववन्दे विश्वसम्भवम् ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
ततो नाराय़णो माय़ामास्थितो मोहिनीं प्रभुः |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
ततो नार्यो नृसिंहानां स च योधजनस्तदा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
ततो नालीकनाराचैर्भल्लशक्त्यृष्टितोमरैः |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
ततो निःशेषमभवत्तत्सैन्यं तव भारत ||
१३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
ततो निक्षिप्य राजानं धृष्टद्युम्नाय़ पाण्डवः |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततो निजघ्नुरन्योन्यं पेतुश्चाहवताडिताः |
२७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
ततो निद्रावशं प्राप्तौ कृपभोजौ महारथौ |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततो निधनमापन्नो मानुषत्वमुपाश्नुते ||
७८ ख
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो निनादः सुमहान्पाण्डवान्तःपुरेऽभवत् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
ततो निनादः सुमहान्समुत्थितः; सशङ्खनानाविधवाणघोषवान् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
ततो निनादो भूतानामाकाशे समजाय़त |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततो निपतितो भूमाविन्द्रध्वज इवोच्छ्रितः ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो निपीडितैर्गात्रैः पिण्डीकृत इवावभौ |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
ततो निमित्तमन्विच्छन्ददर्श स महामनाः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो निमित्ते कस्मिंश्चिद्धर्मराजो युधिष्ठिरः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
ततो निम्नं स्थलं चैव स मृगोऽद्रवदाशुगः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
ततो निर्मथ्यमानस्य सागरस्येव निस्वनः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो निर्मुच्य वाहुभ्यां वलय़ानि स वीर्यवान् |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
ततो निर्याय़ कौन्तेय़ व्यवस्थाप्य च तद्वलम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
ततो निर्याय़ नगरात्प्रय़यौ पुरुषोत्तमः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
ततो निर्वचनं लोके सर्वराष्ट्रेष्ववर्तत ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
ततो निर्वर्तय़ामास दानय़ज्ञं कुरूद्वहः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
ततो निर्वासनीय़ः स्यात्तस्माद्देशात्सवान्धवः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
ततो निवद्धहृदय़ः पुनरागम्य तां सभाम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
ततो निवध्य तां नावमदूरे काश्यपाश्रमात् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
ततो निवातकवचा मामय़ुध्यन्त माय़या ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
ततो निवातकवचा वध्यमाना मय़ा युधि |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१६९
अर्जुन उवाच
ततो निवातकवचा व्योम सञ्छाद्य केवलम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
ततो निवातकवचाः सर्व एव समन्ततः |
१३ क