द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनार्थे हनिष्यामि सकर्णाः ससुय़ोधनाः ||
२५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनाश्विसुतौ वीरौ निवोधत वचो मम ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनास्त्रं तु राधेय़ः संवार्य शरवृष्टिभिः |
५४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुने गाण्डिवं कृष्णे चक्रं तार्क्ष्यकपिध्वजौ |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
अर्जुने विजय़ो नित्यं कृष्णे कीर्तिश्च शाश्वती ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुने विमनस्के च गीता भगवता स्वय़म् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
धृतराष्ट्र उवाच
अर्जुने सैन्धवं प्राप्ते भारद्वाजेन संवृताः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेति जनः कश्चित्कश्चित्कर्णेति भारत |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेति तृतीय़ं च कुन्तीपुत्रानकल्पय़न् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन कृते सङ्ख्ये शरगर्भगृहे तदा ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेन जिता सेय़मृत्विग्भ्यः प्रापिता मय़ा ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन तपस्तप्त्वा गन्धर्वेभ्यो यदाहृतम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन प्रतिज्ञातमार्तेन हतवन्धुना |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन प्रतिज्ञाते पाञ्चजन्यं जनार्दनः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन प्रतिज्ञाते वधे कर्णसुतस्य तु |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेन प्रय़ुक्तांस्तान्वाणान्वेगवतस्तदा |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेन यमाभ्यां च गुरुवत्पर्युपस्थितः ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेन यमाभ्यां च त्रिभिस्तैरभिवादितः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन यमाभ्यां वा भीमसेनेन वा पुनः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२८६
सूर्य उवाच
अर्जुनेन विनाशं हि तव दानवसूदनः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन विहीनस्तु यदि नोत्सृजते रणम् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेन शरैर्नुन्ना प्रतिमार्गमथागमत् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
अर्जुनेन समं युद्धं मम यौधिष्ठिरे वले |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेन समो युद्धे भवेय़मिति मे मतिः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेन सहाक्रीडच्छरैः संनतपर्वभिः ||
४५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन हतं पूर्वं यज्जघान कुरूद्वहम् ||
३७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेन हतः सङ्ख्ये वीरलक्षणलक्षितः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन हतैः सङ्ख्ये तथा भारत वाजिभिः |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन हतो राजन्महावीर्यो जय़द्रथः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४३
कुन्त्यु उवाच
अर्जुनेनार्जितां पूर्वं हृतां लोभादसाधुभिः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेनार्जुनं द्रोणो मनसैवाभ्यपूजय़त् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेनार्जुनो यः स कृष्ण वाहुसहस्रिणा |
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेनास्य सम्प्रीतिमधिकामुपलक्षय़े ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेनैवमुक्तस्तु भीमो भीमस्य रक्षसः |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनेनैवमुक्तस्तु वैराटिर्हेमभूषितान् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनो जय़तां श्रेष्ठः पर्यवर्तत भारत ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो जय़तां श्रेष्ठो वासुदेवमथाव्रवीत् |
७९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो दुःखसन्तप्तः सव्रीडमिदमव्रवीत् ||
८४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो द्रौणिना विद्धो युद्धे वहुभिराय़सैः |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो द्रौपदेय़ाश्च चेकितानश्च संय़ुगे |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनो धनुषोऽभ्याशे तस्थौ गिरिरिवाचलः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो ध्वजिनीं राजन्नभीक्ष्णं समकम्पय़त् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
अर्जुनो नकुलश्चैव सहदेवश्च वीर्यवान् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
अर्जुनो नाम तेजस्वी क्षत्रिय़ो हैहय़ान्वय़ः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो निशितैर्वाणैरनय़द्यमसादनम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो निशितैर्वाणैर्जघान तव वाहिनीम् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
अर्जुनो नैव युद्धार्थी भूय़सी हि दय़ार्जुने ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो भरतश्रेष्ठः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ||
३८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
अर्जुनो भीमसेनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ |
५१ क