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उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
दंशितः पाण्डुरेणाहं कवचेन वपुष्मता ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
दंशितः प्रतिजग्राह भीमसेनः प्रतापवान् |
३० ख
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
दंशिता विविधैस्त्राणैर्विविधाय़ुधपाणय़ः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
दंशिताः क्रूरकर्माणः काम्वोजा युद्धदुर्मदाः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
दंशितानामपि रणे अजेय़ौ कृष्णपाण्डवौ ||
३३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
भीमसेन उवाच
दंशितेष्वरिसैन्येषु भ्रातॄनुत्सृज्य पार्थिव ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
दंशितैर्हरिभिर्युक्तं रथमास्थाय़ काञ्चनम् ||
१ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
दंशोत्थानं सझिल्लीकं मक्षिकामशकावृतम् |
१८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
दंष्ट्राकरालवदनं व्यादितास्यं भय़ावहम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि; दृष्ट्वैव कालानलसंनिभानि |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
दंष्ट्राभ्यां प्रविनिर्धूता ममैते दक्षिणां दिशम् |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
दंष्ट्राविलग्नान्मृत्पिण्डान्विधूय़ सहसा प्रभुः |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
दंष्ट्राश्च दंष्ट्रिणां तेषां मर्मस्वपि निपातिताः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
दंष्ट्रिणो भीमरूपाश्च निवसन्त्यात्मरक्षिणः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
दंष्ट्रिभ्यश्च पशुभ्यश्च प्राकृतो वध उच्यते ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
दक्षः पर्याप्तवचनः स ते स्यात्प्रत्यनन्तरः ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिः कश्यपस्तथा ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षः प्रजापतिश्चैव गन्धर्वाप्सरसस्तथा ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३१
उमो उवाच
दक्षक्रतुहर त्र्यक्ष संशय़ो मे महानय़म् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
दक्षक्रतुहरश्चैव भगनेत्रहरस्तथा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षस्त्वजाय़ताङ्गुष्ठाद्दक्षिणाद्भगवानृषिः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षस्य तनय़ा यास्ताः प्रादुरासन्विशां पते |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
दक्षस्य दश पुत्राणां सहस्राणि प्रजापतेः ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
दक्षस्य दुहिता देवी सुरभिर्नाम नामतः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यतिगर्विता |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षस्यादितिः |
७ क
वन पर्व
अध्याय २२०
स्वाहो उवाच
दक्षस्याहं प्रिय़ा कन्या स्वाहा नाम महाभुज |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
दक्षां पृथ्वीं वृहतीं विप्रकृष्टां; शिवामृतां सुरसां सुप्रसन्नाम् |
८५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
उमो उवाच
दक्षिणं च मुखं रौद्रं केनोर्ध्वं कपिला जटाः |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणं दक्षिणः काले सम्भृत्य स्वभुजं तदा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
दक्षिणं दक्षिणेनैव सव्यं सव्येन पीडय़ेत् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
दक्षिणं नगरद्वारमवामृद्नाद्दुरासदम् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य भारत ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य रक्षणे ||
९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणं पक्षमासाद्य स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणं पार्श्वमास्थाय़ समतिष्ठन्त दंशिताः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
दक्षिणं भीमसङ्काशं रौद्रं संहरति प्रजाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणं भुजमासाद्य पीडय़न्भरतर्षभ ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणं मण्डलं राजन्धार्तराष्ट्रोऽभ्यवर्तत |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
दक्षिणं मण्डलं सव्यं गोमूत्रकमथापि च |
२० क
विराट पर्व
अध्याय ४८
अर्जुन उवाच
दक्षिणं मार्गमास्थाय़ शङ्के जीवपराय़णः ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
दक्षिणं यो धुरं युक्तः सुग्रीवसदृशो हय़ः ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
दक्षिणं वाथ वामं वा पार्श्वमासीत पण्डितः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षिणं शालसङ्काशमूरुं भेजे शुभानना ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणं शृङ्गमास्थाय़ भीमसेनो व्यरोचत |
११ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
दक्षिणं सिन्धुमासाद्य व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |
७२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणश्चाभवत्पक्षः कैकेय़ोऽक्षौहिणीपतिः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
दक्षिणस्यां तु पुण्यानि शृणु तीर्थानि भारत |
१ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
दक्षिणस्यां दिशि यमं प्रत्यपश्यं व्यवस्थितम् |
१४ क