वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
द्रक्ष्यामि पृथिवीराज्ये पितृपैतामहे स्थितम् ||
२९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
द्रक्ष्यामि वनसंस्थं च धृतराष्ट्रं महीपतिम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
द्रक्ष्ये दितिजसङ्घानां मर्दनं त्रिदशेश्वरम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
द्रमिळाश्च कलिङ्गाश्च पुलिन्दाश्चाप्युशीनराः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
द्रवच्च स्ववलं दृष्ट्वा पौरुषेण न्यवारय़त् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
द्रवतश्च महीपालान्सर्वान्यौधिष्ठिरे वले ||
४४ ख
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रवतस्तांस्तु सम्प्रेक्ष्य स वज्री दानवानिव |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
द्रवतस्तान्समालोक्य भीष्मद्रोणौ महारथौ |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
द्रवतस्तान्समालोक्य राजा दुर्योधनो नृप |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
द्रवतां च पदातीनां शस्त्राणां विनिपात्यताम् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
द्रवतां योधमुख्यानां गाण्डीवप्रेषितैः शरैः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
द्रवतां सादिनां चैव गजानां च विशां पते |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
द्रवतामथ तेषां तु युधि नान्योऽस्ति मानवः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
द्रवते च महत्सैन्यं पाण्डवस्य महात्मनः |
६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
द्रवद्भिरथ भग्नैश्च परिवर्तद्भिरेव च |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
द्रवद्भिस्तत्र राजेन्द्र कृतः शव्दोऽतिदारुणः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
द्रवद्भिस्तैर्महानागैः समन्ताद्भरतर्षभ |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणं तथा क्रुद्धं सात्यकिं पाण्डवो वली |
४५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणं तु तत्सैन्यं तव पुत्रस्य संय़ुगे |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणं तु तत्सैन्यं दृष्ट्वा विगतचेतनम् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणं तु तत्सैन्यं द्रोणकर्णौ महारथौ |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणं वलं दृष्ट्वा पलाय़नकृतक्षणम् |
८९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणां च राजेन्द्र नावस्थापय़से रणे ||
९० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणानपश्याम द्राव्यमाणांश्च संय़ुगे ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणान्रथोदारान्किरन्तं विशिखैः शितैः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
द्रवमाणे च भीते च तवास्मीति च वादिनि ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणे तथा सैन्ये त्रस्तरूपे हतौजसि |
८७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणे महाराज कौरवाणां वले तथा |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
धृतराष्ट्र उवाच
द्रवमाणे वलौघे च निराक्रन्दे मुहुर्मुहुः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणेषु योधेषु निनदत्सु च दन्तिषु ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
द्रवमाणेषु शूरेषु सोदरेषु तथाभिभो |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
द्रवाणां चैव सर्वेषां पेय़ानामाप उत्तमाः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
द्रविडाः केरलाः प्राच्या भूषिका वनवासिनः |
५७ क
सभा पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रविडाः सिंहलाश्चैव राजा काश्मीरकस्तथा |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
द्रविडान्ध्रनिषादास्तु पुनः सात्यकिचोदिताः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रविणोपार्जनं भूरि पात्रेषु प्रतिपादनम् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
द्रविष्यन्ति सपाञ्चाला विष्णुं दृष्ट्वेव दानवाः |
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रवीभूतमिवात्युष्णमुत्सृजद्वारि नेत्रजम् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
दुर्योधन उवाच
द्रवेद्यथेष्टं तद्वत्स्यादृते सेनापतिं वलम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
द्रव्यं ह्यहीनमनसो नान्यथेति विनिश्चय़ः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
द्रव्यत्यागे तु कर्माणि भोगत्यागे व्रतान्यपि |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
द्रव्यनाशो वधोऽकीर्तिरय़शश्च पलाय़ने ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
द्रव्यभूता गुणाः सर्वे तिष्ठन्ति हि पराक्रमे |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
द्रव्यमात्रमभूत्सत्त्वं पुरुषस्येति निश्चय़ः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
द्रव्ययज्ञास्तपोय़ज्ञा योगय़ज्ञास्तथापरे |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
द्रव्यवन्तश्च शूराश्च शस्त्रज्ञाः शास्त्रपारगाः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रव्यवानभिरूपो वा न मेऽन्यः पुरुषो मतः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
द्रव्यागमो नृणां सूक्ष्मः पात्रे दानं ततः परम् |
६८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
द्रव्याणां सञ्चय़श्चैव कर्तव्यः स्यान्महांस्तथा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
द्रव्याणामतिशक्त्यापि देय़मेषां कृतादपि ||
१४ ख