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अनुशासन पर्व
अध्याय २३
भीष्म उवाच
द्रव्याणि चान्यानि तथा प्रेत्यभावे न शोचति ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
द्रव्याणि सन्ततिश्चैव सर्वं भवति जीवतः ||
१८६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
द्रव्याणि स्थापितानि स्म विधिवत्कुशलैर्जनैः ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
द्रव्याद्द्रव्यस्य निष्पत्तिरिन्द्रिय़ादिन्द्रिय़ं तथा |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रव्यार्थस्पर्शसंय़ोगे या प्रीतिरुपजाय़ते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३
सहदेव उवाच
द्रव्येषु यस्य ममता मृत्योरास्ये स वर्तते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
द्रव्येषु समतीतेषु ये गुणास्तान्न चिन्तय़ेत् |
५ क
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
द्रव्येषु सृजते वुद्धिं विविधेषु परावराम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
द्रव्यैरनेकैर्विविधैर्गदसाम्वोद्धवादिभिः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
द्रव्यैर्युक्तं सम्प्रहारोपपन्नै; र्वाहैर्युक्तं तूर्णमावर्तय़स्व ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
द्रव्योपकरणं कच्चित्सर्वदा सर्वशिल्पिनाम् |
१०७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
द्रव्योपकरणं सर्वं नान्ववैक्षत्कुटुम्विनी ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
द्रष्टव्यं तु भवेत्प्राज्ञ क्रूरे कर्मणि वर्तता |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३८
वाय़ुरु उवाच
द्रष्टव्यं नैतदेवं हि कथं ज्याय़स्तमो हि सः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
वदान्य उवाच
द्रष्टव्या सा त्वय़ा तत्र सम्पूज्या चैव यत्नतः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
द्रष्टव्यौ नित्यमेवैतौ तत्परेणान्तरात्मना |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
द्रष्टा द्रष्टव्यं श्राविता श्रावणीय़ं; ज्ञाता ज्ञेय़ं सगुणं निर्गुणं च |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टा मां त्वं च लोकश्च विकर्षन्तं वरान्वरान् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
द्रष्टा युद्धे सात्यकेर्वै सुय़ोधन; स्तदा तप्स्यत्यकृतात्मा स मन्दः ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
द्रष्टा रणे संय़तं केशवेन; तदा तप्स्यत्यकृतात्मा स मन्दः ||
४६ ख
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
द्रष्टा सदा नारदस्य धौम्यस्तेऽय़ं पुरोहितः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०७
भीष्म उवाच
द्रष्टा स्वर्गस्य न ह्यस्ति तथैव नरकस्य च |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २३८
दुर्योधन उवाच
द्रष्टारः स्म सुखाद्धीनान्सदारान्पाण्डवानिति ||
३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
द्रष्टारमुच्चनीचानां कर्मभिर्देहिनां गतिम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
द्रष्टारो देवसङ्घानामृषीणां च महात्मनाम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टारो न हि वीभत्सुर्भारमुद्यम्य सीदति ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६९
धृतराष्ट्र उवाच
द्रष्टारो हि कुरवस्तं समेता; महात्मानं शत्रुहणं वरेण्यम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टासि युधि सम्वाधे प्रवृत्ते वैशसेऽहनि |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
अर्जुन उवाच
द्रष्टासि श्वो महेष्वासान्नाराचैस्तिग्मतेजनैः |
४० क
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
द्रष्टास्यद्य वदतो द्वारपाल; मनीषिभिः सह वादे विवृद्धे |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
द्रष्टास्यद्य शरैः कर्णं रणे कृत्तमनेकधा |
८० क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
द्रष्टास्यनघ देवेन्द्रं स च तेऽस्त्राणि दास्यति ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
अकृतव्रण उवाच
द्रष्टास्येनमिहाय़ान्तं तव दर्शनकाङ्क्षय़ा ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
द्रष्टुं कन्याश्च कल्याण्यस्ताश्च यास्यन्त्यनावृताः ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुं कुरुपतेः पुत्रान्पाण्डवान्पृथुवक्षसः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
भीम उवाच
द्रष्टुं कुरुश्रेष्ठमभिप्रय़ातुं; प्रोवाच वृष्णिप्रवरं तदानीम् ||
६५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
द्रष्टुं न सम्प्रीतिकरः शशीव; कृष्णश्य पक्षस्य चतुर्दशाहे ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ४३
अर्जुन उवाच
द्रष्टुं वाप्यथ वा स्प्रष्टुमारोढुं कुत एव तु ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुं विवाहं परमप्रतीता; द्विजाश्च पौराश्च यथाप्रधानाः ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुं स्प्रष्टुमथ श्रोतुं वद कर्तास्मि तत्तथा ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुं हि पाण्डुदाय़ादांस्त्वरन्ते कुरवो भृशम् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुकामं कुरुश्रेष्ठं प्रय़ास्यन्तं धनञ्जय़म् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुकामः सभां चैव धर्मराजं च पाण्डवम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय २०३
नारद उवाच
द्रष्टुकामस्य चात्यर्थं गताय़ाः पार्श्वतस्तदा |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुकामाः प्रतीक्षन्ते पुरं च विषय़ं च नः ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुकामाः सभां चैव धर्मराजं च पाण्डवम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
द्रष्टुमत्युग्रकर्माणं विषहेत नरर्षभम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २०४
व्याध उवाच
द्रष्टुमर्हसि धर्मज्ञ मातरं पितरं च मे ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रष्टुमस्त्राणि चादातुमिन्द्रादिति विवासितः ||
६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
द्वाःस्थ उवाच
द्रष्टुमिच्छति ते पादौ किं करोतु प्रशाधि माम् ||
४ ख