chevron_left  तद्वाणधारावृतमन्तरिक्षं;arrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
तद्वाणधारावृतमन्तरिक्षं; तिर्यग्गताभिः समरे रराज |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
तद्वाणवर्षं तुमुलं विषेहे स चमूपतिः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
तद्वाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् |
८१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
तद्वाणैरर्दितं यूथं रक्षसां पीनवक्षसाम् |
९६ क
मौसल पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वानरेभ्यः प्रददुः सुरागन्धसमन्वितम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वाशु क्रिय़तां राजन्प्राप्तिर्वाप्यधिगम्यताम् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
तद्वासो दर्शय़ामासुस्तस्य कार्ये निवेदिते |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तद्विकारांश्च वाह्लीकाः खादन्ति च पिवन्ति च ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
तद्विघातार्थमसृजदर्जुनोऽप्यस्त्रमुत्तमम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
तद्विजेतुं समुत्तिष्ठ गोधनं राष्ट्रवर्धनम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
तद्विज्ञानाच्चरन्प्राज्ञः प्राप्नुय़ात्परमां गतिम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
श्रीरु उवाच
तद्विज्ञाय़ महेन्द्रेण तव शीलं हृतं प्रभो ||
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय ३०
सूत उवाच
तद्विज्ञाय़ हृतं सर्पाः प्रतिमाय़ाकृतं च तत् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १६९
वसिष्ठ उवाच
तद्वित्तं ददृशुः सर्वे समेताः क्षत्रिय़र्षभाः ||
१७ ग
आदि पर्व
अध्याय १४४
व्यास उवाच
तद्विदित्वास्मि सम्प्राप्तश्चिकीर्षुः परमं हितम् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
तद्विदीपितमाकाशं सूर्येणेव घनात्यये ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३
सहदेव उवाच
तद्विद्धि पृथिवीपाल भक्त्या भरतसत्तम ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवय़ा |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
तद्विद्वांसोऽनुपश्यन्ति ज्ञानदीर्घेण चक्षुषा ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
तद्विद्वानक्षरं प्राप्य जहाति प्राणजन्मनी ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
तद्विद्वाननुवुध्येत मनसा कर्मनिश्चय़म् ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्विधानि नरेन्द्राणां कारय़ामास केशवः ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
तद्विधास्ते मनुष्येषु येषां धर्मो न कारणम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
तद्विमोक्षाय़ ये चापि यतन्ते पुरुषाः क्वचित् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
तद्विश्वभावसञ्ज्ञान्तं पौरुषीं तनुमास्थितम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
तद्विसृष्टं जघानाशु पार्श्वं स्कन्दस्य दक्षिणम् |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
तद्विहत्यास्य राधेय़स्तत एनं समभ्ययात् |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तद्विहाय़ धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
तद्विय़ोगाद्धि तान्सर्वाञ्शोकः समभिपुप्लुवे |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
तद्वीजं देहिनामाहुस्तद्वीजं जीवसञ्ज्ञितम् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
तद्वीजं सर्वभूतानां तेन जीवन्ति जन्तवः ||
६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
तद्वीर्यश्चापि तत्रैव कुले शिनिरभून्नृपः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
तद्वुद्ध्वा भृशसन्तप्तो देवराजः शतक्रतुः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
तद्वुद्धय़स्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्पराय़णाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
तद्वुधा न प्रशंसन्ति मरणं न प्रतीक्षते ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तद्वृक्षय़ुद्धमभवत्सुमुहूर्तं विशां पते |
५० क
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
तद्वृक्षय़ुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वृक्षय़ुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वृक्षय़ुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७
कृष्ण उवाच
तद्वृणीतां भवानग्रे प्रवार्यस्त्वं हि धर्मतः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वृत्तं तु त्रय़ोदश्यां समवेतं महात्मनोः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वेद विदुरः सर्वं सरहस्यं महाकविः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
तद्वै कर्तास्मि कौरव्य वचनात्तव नान्यथा ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय २२१
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वै कर्तुं परः कालो मातरेष भवेत्तव ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
तद्वै ज्योतींषि सर्वाणि प्राप्य भासन्ति नोऽपि च |
२० क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
तद्वै तत्त्वं सर्वमाज्ञाय़ मातु; रित्यव्रवीच्छ्वेतकेतुं स विप्रः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
तद्वै दद्याद्व्राह्मणाय़ श्रद्धावाननसूय़कः |
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
तद्वै देवा उपासन्ते यस्मादर्को विराजते |
१ ख
वन पर्व
अध्याय ६
विदुर उवाच
तद्वै पथ्यं तन्मनो नाभ्युपैति; ततश्चाहं क्षममन्यन्न मन्ये ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
शौनक उवाच
तद्वै पारत्रिकं चारु व्राह्मणानामकुप्यताम् |
१४ क