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द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं पञ्चाशतेषूणां कर्णं च दशभिः शरैः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं पितामहं भीष्मं क्षत्तारं वाह्लिकं कृपम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं प्रति जिघांसन्तं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं प्रति महाराज विराटश्चैव संय़ुगे ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं प्रति यय़ौ यत्तः पाञ्चाल्यः सह सोमकैः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं मत्स्यादवरजः शतानीकोऽभ्यवर्तत ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं मोहाद्युधा पार्थ यज्जिगीषसि तन्मृषा |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
धृतराष्ट्र उवाच
द्रोणं यः सम्प्रमथ्यैकः प्रविष्टो मम वाहिनीम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं यत्ताः पराक्रान्ताः सर्वे रक्षत पृष्ठतः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं युधि पराक्रम्य शरैर्विव्याध पञ्चभिः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं रक्षत पाञ्चाल्याद्धृष्टद्युम्नान्महारथात् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं रणे शत्रुसहोऽभिय़ाता; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं रहस्युपागम्य कर्णो वचनमव्रवीत् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं विव्याध विंशत्या सर्वपारशवैः शरैः ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं विव्याध सप्तत्या रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं विव्याध सप्तत्या स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः |
१८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं वृहस्पतेः पार्श्वे गुरुमेनं निशामय़ ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३९
व्यास उवाच
द्रोणं वृहस्पतेर्भागं विद्धि द्रौणिं च रुद्रजम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं व्यपदिशञ्शिष्यो वासुदेवसहाय़वान् ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं षष्ट्या नरव्याघ्रो विकर्णं च त्रिभिः शरैः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं स जित्वा पुरुषप्रवीर; स्तथैव हार्दिक्यमुखांस्त्वदीय़ान् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं सङ्कीर्त्य भीष्मं च सोमदत्तं च वाह्लिकम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय २
वलदेव उवाच
द्रोणं सपुत्रं विदुरं कृपं च; गान्धारराजं च ससूतपुत्रम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं सोऽभिजघानाशु विंशद्भिः कङ्कपत्रिभिः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं स्म ददृशुः शूरं विनिघ्नन्तं वरान्वरान् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं हत्वा किल मय़ा हन्तव्यस्त्वं सुदुर्मते |
३० ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं हि समरे कोऽन्यो योद्धुमर्हति फल्गुनात् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणः करिष्यते यत्नं सर्वथा मम वारणे |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणः कृपः सैन्धववाह्लिकौ च; भूरिश्रवाः शल्यशलौ च राजन् |
१३१ ख
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणः कृपश्चैव विविंशतिश्च; दुःशासनश्चैव निवृत्य शीघ्रम् |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणः पञ्च दिनान्युग्रो विधम्य रिपुवाहिनीः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
द्रोणः पाञ्चालपुत्रेण वली वलवता सह |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
द्रोणः पाञ्चालपुत्रेण समागम्य महारणे |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणः पाञ्चालराजानं विद्ध्वा दशभिराशुगैः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणः पुरस्ताज्जघने तु शल्य; स्तथा द्रौणिः पार्श्वतः सौवलश्च |
११ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणः प्रत्युद्ययौ पार्थं मत्तो मत्तमिव द्विपम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणः प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुषर्षभ ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणः प्रावर्तय़त्तत्र नदीमन्तकगामिनीम् ||
३६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
द्रोणः शरैरसम्भ्रान्तो ज्यां चिच्छेदाशु वीर्यवान् ||
१२ ग
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
द्रोणः शिष्यांस्ततः सर्वानिदं वचनमव्रवीत् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणः सङ्कीर्णय़ुद्धेषु शिक्षय़ामास पाण्डवम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
द्रोणः सपुत्रश्च कृपश्च विप्रो; महेष्वासाः कच्चिदेतेऽप्यरोगाः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणः सर्वानशेषेण दक्षिणार्थं महीपते ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणकर्णकृपा वीरा भीमपार्षतसात्यकाः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणकर्णकृपैः सार्धं भीष्मेण च महात्मना ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
द्रोणकर्णकृपैर्गुप्तां महेष्वासैः प्रहारिभिः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणकर्णप्रभृतय़ो येन प्रतिसमासिताः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणकर्णमुखैः षड्भिर्धार्तराष्ट्रैर्महारथैः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणकर्णादिभिः सार्धं पर्याप्तोऽहं द्विषद्वधे |
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
द्रोणकर्णान्तरगतं कृपस्यापि च भारत |
१५४ ख