द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तस्थौ महाराज व्यादितास्य इवान्तकः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु तद्वचः श्रुत्वा पुत्रस्य तव दुर्मनाः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु त्वरितो युद्धे धृष्टद्युम्नस्य सारथेः |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु दिवमास्थाय़ नक्षत्रपथमाविशत् |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु निशितैर्वाणैर्धृष्टद्युम्नमय़ोधय़त् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु पञ्चभिर्वाणैर्वासुदेवमताडय़त् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु पञ्चविंशत्या श्वेतवाहनमार्दय़त् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु परमक्रुद्धो वाय़व्यास्त्रेण पार्थिवम् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु परमक्रुद्धो वाय़व्यास्त्रेण संय़ुगे |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु पाण्डवानीके चकार कदनं महत् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु रथिनां श्रेष्ठः सोमकान्सृञ्जय़ैः सह |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु वहुधा विद्धो वृहत्क्षत्रेण मारिष |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु विवरं लव्ध्वा भीमसेनं शिलीमुखैः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु शरवर्षेण छाद्यमानो महारथः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु सत्वरो राजन्क्षिप्तो भीमेन संय़ुगे |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु सप्तदशभिः शरैराशीविषोपमैः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु समरे क्रुद्धो भीमं नवभिराय़सैः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु समरे भीमं वारय़ित्वा शरोर्मिभिः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु समरे वीरं निर्दहन्तं सुतांस्तव |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु सात्यकिं विद्ध्वा भीमसेनमविध्यत |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य कर्म तद्दृष्ट्वा कोपदुःखसमन्वितः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य च महाराज भीमस्य च महात्मनः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य च महाराज सृञ्जय़ानां च सर्वशः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणस्य च महावाहो कृपस्य च महात्मनः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य च रणे राजन्घोरं देवासुरोपमम् ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य च व्यदृश्यन्त विसर्पन्तो महाशराः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणस्य तु तदा शिष्यौ गदाय़ोग्यां विशेषतः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य तु वचः श्रुत्वा त्रिगर्ताधिपतिस्ततः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
अभिमन्युरु उवाच
द्रोणस्य दृढमव्यग्रमनीकप्रवरं युधि |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य निधनाकाङ्क्षी चिक्षेप स पराक्रमी ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य निधने नूनं सङ्क्रुद्धो द्विपदां वरः ||
४४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
द्रोणस्य निहतस्यापि दृश्यते जीवतो यथा ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य पश्यतः सैन्यं गाङ्गेय़स्य च पश्यतः |
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य पाण्डवैः सार्धं युय़ुधानपुरोगमैः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणस्य पुङ्खसक्ताश्च प्रभवन्तः शरासनात् |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य प्रीतिसंय़ुक्तं श्रुत्वा वाक्यं तवात्मजः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
द्रोणस्य भीष्मस्य च नास्ति सत्त्वं; ध्रुवं तथैवास्य महात्मनोऽपि |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
द्रोणस्य भीष्मस्य च वै राधेय़स्य च मे श्रुतम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य मतमाज्ञाय़ योद्धुकामस्य तां निशाम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
द्रोणस्य मिषतः सोऽहं सगणस्य विलप्यतः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य मिषतो युद्धे प्रेषय़ामास साय़कान् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य मिषतो व्यूहं भित्त्वा प्राविशदार्जुनिः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
धृष्टद्युम्न उवाच
द्रोणस्य यतमानस्य वशं नैष्यसि सुव्रत |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य रथघोषेण मौर्वीनिष्पेषणेन च |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य रथनिर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम् |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य रथपर्यन्तं रथिनो रथमास्थिताः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य रथमालोक्य प्रहृष्टाः कुरवोऽभवन् ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणस्य वचनं श्रुत्वा धृतराष्ट्रोऽव्रवीदिदम् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य विदिता राजन्धृष्टद्युम्नमवाक्षिपन् ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
द्रोणस्य शरजालानि प्राणिदेहहराणि च |
२४ क