शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
द्वावेतौ ग्रसते भूमिः सर्पो विलशय़ानिव |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
५०
दुर्योधन उवाच
द्वावेतौ ग्रसते भूमिः सर्पो विलशय़ानिव |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
द्वावेतौ पक्षिणौ नित्यौ सखाय़ौ चाप्यचेतनौ |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
द्वावेतौ प्रेत्य पन्थानौ दिवं चाधश्च गच्छतः ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
द्वावेव किल वृष्णीनां तत्र ख्यातौ महारथौ |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
द्वावेव तु महाराज तस्माद्युद्धाद्व्यपेय़तुः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
द्वासप्ततिमतिश्चैव प्रोक्ता या च स्वय़म्भुवा |
७१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
द्विकालमग्निं जुह्वानः शुचिर्भूत्वा समाहितः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
द्विगुणं च रजो ज्ञात्वा सत्त्वमेकगुणं पुनः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
द्विगुणं जवमास्थाय़ कम्पय़ंश्चरणैर्महीम् ||
४३ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
द्विगुणं त्वं तथा वेत्थ मद्रराज न संशय़ः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
द्विगुणं योगकृत्यं तु योगानां प्राहुरुत्तमम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
द्विगुणा व्रह्महत्या वै आत्रेय़ीव्यसने भवेत् ||
५० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
द्विगुणाय़ाः शतस्यैवं सहस्रस्य च कारय़ेत् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
द्विगुणीकृततेजा हि प्रज्वलन्निव पावकः |
६२ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
द्विगुणेनैव कालेन द्वितीय़ं मासमत्यगात् ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
द्विचत्वारिंशदध्याय़ाः पर्वैतदभिसङ्ख्यया ||
२१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
द्विज सक्तूनिमान्भूय़ः प्रतिगृह्णीष्व सत्तम ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
द्विजच्छेदं न कुर्वीत भुक्त्वा न च समाचरेत् ||
११५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
द्विजप्रभावाद्राजेन्द्र जीवितः सवनस्पतिः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
द्विजरूपेण कौन्तेय़ किं ते सूर्योऽपराध्यते ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
द्विजशुश्रूषय़ा राज्यं द्विजत्वं वापि पुष्कलम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रय़युः काम्यकं वनम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
द्विजस्त्रीणां वधं कृत्वा किं दैवेन न वारितः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
ऐल उवाच
द्विजस्य क्षत्रवन्धोर्वा कस्येय़ं पृथिवी भवेत् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
सूत उवाच
द्विजस्य योऽददद्द्रव्यं मा नृपं जीवय़ेदिति ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
द्विजाः प्रतिग्रहे युक्ता दातारो राजवंशजाः |
८१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
द्विजाग्र्येभ्यः सम्प्रय़च्छ प्रतीतो; गाः पुण्या वै प्राप्य राज्यं कुरूणाम् ||
२८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
द्विजाग्र्यैः समनुज्ञातस्त्रिदिवे मोदतां सुखी ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
द्विजाग्र्यो जाय़ते विद्वान्कन्यसीं वृत्तिमास्थितः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
द्विजातिः श्रद्धय़ोपेतः स यष्टुं पुरुषोऽर्हति ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
द्विजातिपूजने चाहं धर्मे च निरतः सदा |
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
द्विजातिपूजाभिरतो दाता ज्ञातिषु चार्जवी |
६३ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
द्विजातिपूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति ||
८५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
द्विजातिभिरभक्ष्यास्ते दीक्षितैश्च तपोधनैः ||
५८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
द्विजातिभ्यो विसृजन्भूरि वित्तं; रराज वित्तेश इवारिहन्ता ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
द्विजातिभ्योऽनुरूपेभ्यः कामानुच्चावचांस्तथा |
१२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
द्विजातिमभिसत्कृत्य श्वः कालमभिवेद्य च |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
द्विजातिमुख्याः सहिताः पृथक्च; भवद्भिरासाद्य तपस्विनश्च |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
द्विजातिमुख्यानृषभः कुरूणां; सन्तर्पय़ामास महानुभावः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
द्विजातिमुख्येषु धनं विसृज्य; गोदावरिं सागरगामगच्छत् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
द्विजातिहस्तान्निर्वृत्ता न तु तुल्यात्परस्परम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
द्विजातीनां सतां नित्यं सदैवैष प्रवर्तते ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
द्विजातीन्देवताश्चापि चैत्यानथ चतुष्पथान् ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
द्विजातीन्वाच्य पुण्याहं स्वस्ति चैव महाद्युते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
धर्म उवाच
द्विजाते पश्य मां धर्ममहं त्वां द्रष्टुमागतः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
भीष्म उवाच
द्विजातेः कस्यचित्तात तुल्यवर्णः सुतः प्रभुः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
द्विजातेः कस्यचित्पार्थ स्वाध्याय़निरतस्य वै |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
द्विजातेर्व्रह्मभूतस्य स्पृहय़न्ति दिवौकसः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८८
वैशम्पाय़न उवाच
द्विजातय़ो महाभागा वृद्धवालतपस्विषु |
१४ क