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कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
द्विपस्य पादाग्रकरान्स पञ्चभि; र्नृपस्य वाहू च शिरोऽथ च त्रिभिः |
४० क
विराट पर्व
अध्याय २
भीम उवाच
द्विपा वा वलिनो राजन्वृषभा वा महावलाः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
द्विपांश्च पद्भ्यां चरणैः करेण च; द्विपास्थितो हन्ति स कालचक्रवत् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
द्विपाः प्रभिन्नाः शार्दूलाः सिंहाः केसरिणस्तथा ||
१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
द्विपाः सम्भिन्नमर्माणो वज्राशनिसमैः शरैः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
द्विपादवहुपादानि तिर्यग्गतिमतीनि च |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
द्विपादहीनो धर्मश्च युगे तस्मिन्भविष्यति ||
७५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
द्विपान्हय़ान्रथांश्चैव सारोहानर्जुनो रणे |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
द्विपाविव विषाणाग्रैः शृङ्गैरिव महर्षभौ |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
द्विपाश्वस्यन्दनेभ्यश्च क्षितिं सर्वेऽवरोहत |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
द्विफल्गुनमिमं लोकं मेनिरे तस्य कर्मभिः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
द्विमासोपरमे काले व्यतीते प्लवगास्ततः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
द्विरंशस्तेन हर्तव्यो व्राह्मणस्वाद्युधिष्ठिर ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
द्विरदं जलसन्धस्य रुधिरेणाभ्यषिञ्चत ||
४६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
द्विरदनरहय़ाः सहस्रशो; रुधिरनदीप्रवहास्तदाभवन् ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
द्विरदरथनराश्वशङ्खशव्दैः; परिहृषिता विविधैश्च शस्त्रपातैः |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
द्विरदरथनराश्वान्सूदय़न्तस्त्वदीय़ा; न्भुजगपतिनिकाशैर्मार्गणैरात्तशस्त्राः ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
द्विरदरथपदातिसार्थवाहाः; परिपतिताभिमुखाः प्रजह्रिरे ते ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
द्विरदरथहय़ा महाहवे; वरपुरुषैः पुरुषाश्च वाहनैः ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
द्विरदानभिविव्याध क्षिप्तैर्गिरिनिभाञ्शरैः |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
द्विरदानां प्रभिन्नानां सहस्राणि चतुर्दश ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
द्विरदानां सहस्रेण द्विसाहस्रैश्च वाजिभिः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
द्विरदान्प्रहतप्रोथान्विपताकध्वजाय़ुधान् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
द्विरदाविव सङ्क्रुद्धौ वाशितार्थे मदोत्कटौ ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
द्विरदास्तुरगाश्चार्ताः पत्तय़ो रथिनस्तथा |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
द्विरदैश्च हतारोहैर्महामात्रैर्हतद्विपैः |
१०९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
द्विरनुव्याहृते राज्ञः स शापो वलवानभूत् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
द्विरर्जुनमिमं लोकं मंस्यते स सुय़ोधनः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४६
व्राह्मण उवाच
द्विरूनं दशरात्रं वै नागस्यागमनं प्रति ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
द्विर्द्वादशेभ्यस्तत्त्वेभ्यः ख्यातो यः पञ्चविंशकः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
द्विवर्षसम्भृतां कुक्षौ तामुत्स्रष्टुं प्रचक्रमे ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
द्विवर्षोपनिवृत्तेषु पाण्डवेषु यदृच्छय़ा |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
द्विवाहुः स्पर्धते नित्यमतीतेनापि केशव ||
२८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
द्विविधं कर्म विज्ञेय़मिज्या दानं च यन्मखे |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
द्विविधं कर्म शूराणां युद्धे जय़पराजय़ौ |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
द्विविधस्य च दण्डस्य प्रय़ोगः कालचोदितः |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
द्विविधस्य महाराज विपरीतं विवर्जय़ेः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
द्विविधा व्राह्मणा राजन्धर्मश्च द्विविधः स्मृतः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
द्विविधानां च भूतानां जङ्गमाः परमा नृप |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
द्विविधानीह भूतानि त्रसानि स्थावराणि च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
द्विविधानीह भूतानि पृथिव्यां पृथिवीपते |
१०२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
द्विविधापीह विज्ञेय़ा व्रह्मय़ोनिः सनातना |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
द्विविधो जाय़ते व्याधिः शारीरो मानसस्तथा |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
द्विविधो जाय़ते व्याधिः शारीरो मानसस्तथा |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
द्विविधो हि स्मृतो गन्ध इष्टोऽनिष्टश्च पुष्पजः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
द्विविधौ चाप्युभावेतौ धर्माधर्मौ विजानताम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
धृतराष्ट्र उवाच
द्विवेदाश्चैकवेदाश्च अनृचश्च तथापरे |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
द्विवेदाश्चैकवेदाश्चाप्यनृचश्च तथापरे ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
द्विशीर्षाश्च द्विपुच्छाश्च दंष्ट्रिणः पशवोऽशिवाः ||
३ ख