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सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
द्वैपाय़ने स्थिते विप्रे कथं कृष्णोऽर्चितस्त्वय़ा ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नेन कृष्णेन देवस्थानेन चाभिभूः ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
द्वैपाय़नेन कृष्णेन नगरे वारणावते ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नेन च तथा देवस्थानेन जिष्णुना ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १
ऋषय़ ऊचुः
द्वैपाय़नेन यत्प्रोक्तं पुराणं परमर्षिणा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नो नारदश्च जामदग्न्यः पृथुश्रवाः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
द्वैपाय़नो नारदश्च देवलश्च महानृषिः |
४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
द्वैपाय़नोष्ठपुटनिःसृतमप्रमेय़ं; पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
द्वैपाय़नौष्ठपुटनिःसृतमप्रमेय़ं; पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च |
२४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
द्वैरथं चापि पार्थेन कामय़ानो महारणे ||
५२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
द्वैरथं द्रोणपुत्रेण पुनरप्यरिसूदनः ||
१०२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
द्वैरथं सूतपुत्रेण पुनरेव विशां पते ||
८९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
द्वैरथे दंशितं यत्तं सर्वशस्त्रभृतां वरम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
द्वैरथे यत्र पार्थेन हतः कर्णो महारथः ||
१७१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
भीम उवाच
द्वैरथे विषहेन्नान्यो भीष्मं राजन्महाव्रतम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
द्वैरथेनास्तु वै शान्तिस्तव वा मम वा नृप ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
द्वौ करं न प्रय़च्छेतां कुन्तीपुत्राय़ भारत |
४२ क
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
द्वौ चास्य पिण्डावधरेण कण्ठ; मजातरोमौ सुमनोहरौ च ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
द्वौ त्रीनपि गजारोहान्पिण्डितान्वर्मितानपि |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
द्वौ त्रय़श्च विनिर्भिन्ना निपेतुर्धरणीतले ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
द्वौ पक्षावभिजानीहि त्वमेतौ पुरुषर्षभ ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०१
नारद उवाच
द्वौ पद्मौ पुण्डरीकश्च पुष्पो मुद्गरपर्णकः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनीषिणौ ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
द्वौ पुत्रौ विनता वव्रे कद्रूपुत्राधिकौ वले |
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
द्वौ पुत्रौ विनताय़ास्तु विख्यातौ गरुडारुणौ ||
६७ ग
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
द्वौ पुत्रौ व्रह्मणस्त्वन्यौ यय़ोस्तिष्ठति लक्षणम् |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ७१
देवय़ान्यु उवाच
द्वौ मां शोकावग्निकल्पौ दहेतां; कचस्य नाशस्तव चैवोपघातः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
द्वौ मासौ तु भवेत्तृप्तिर्मत्स्यैः पितृगणस्य ह |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वौ वरासिधरौ राजन्नेकः शक्तिपताकधृक् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
द्वौ सूर्याविति नो वुद्धिरासीत्तस्मिंस्तथा गते |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३
सहदेव उवाच
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं व्रह्म शाश्वतम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं व्रह्म शाश्वतम् |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं व्रह्म शाश्वतम् |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
द्व्यक्षांस्त्र्यक्षाँल्ललाटाक्षान्नानादिग्भ्यः समागतान् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
द्व्यक्षीं त्र्यक्षीं ललाटाक्षीं दीर्घजिह्वामजिह्विकाम् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
द्व्यूना विंशतिराहताक्षौहिणीनां; तस्मिन्सङ्ग्रामे विग्रहे क्षत्रिय़ाणाम् ||
१५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
द्वय़मेतद्भवेद्राजन्वधस्तत्र प्रशस्यते ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
द्वय़ोः स्त्रिय़ोर्गुणज्येष्ठस्तेषामासीद्युधिष्ठिरः ||
९६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
द्वय़ोरापन्नय़ोः सन्धिः क्रिय़तां मा विचारय़ ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
द्वय़ोरिमं भारत सन्धिविग्रहं; सुभाषितं वुद्धिविशेषकारितम् |
२११ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
द्वय़ोरेकतरे वुद्धिः क्रिय़तामद्य पुष्कर |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
द्वय़ोर्नृशंसकर्तारमवशं काममोहितम् |
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
द्वय़ोस्तु दक्षं प्रवदन्ति मध्यं; स उत्तमो यो निरतस्त्रिवर्गे ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
दय़या यदि वा राजन्द्वेष्यभावान्मम प्रभो |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
दय़या सर्वभूतानां निर्वेदात्सा निवर्तते ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३८
श्रीभगवानु उवाच
दय़ा भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
दय़ा सत्यं च धर्मश्च त्वय़ि सर्वं प्रतिष्ठितम् |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
दय़ां च ज्ञातिषु परां कथय़ां चक्रिरे नृपाः ||
१०१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
दय़ार्थं चैव भूतानां समीक्ष्य पृथिवीं चरेत् |
३३ क