आदि पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ च तस्मै देवेन्द्रस्तं वरं प्रीतिमांस्तदा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
ददौ च माल्यानि सुगन्धवन्ति; चित्राणि वासांसि च भानुमन्ति |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
ददौ च सर्वान्कामांस्ताञ्जमदग्निर्महातपाः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
ददौ चित्ररथस्तुष्टो यांस्तान्गाण्डीवधन्वने |
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ जनार्दनः प्रीत्या सहस्रं हेमभूषणम् ||
४२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ तस्मिन्महाय़ज्ञे व्राह्मणेभ्यः समाहितः ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
ददौ तस्यै स देवेशस्तं वरं प्रीतिमांस्तदा |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१०३
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ तां धृतराष्ट्राय़ गान्धारीं धर्मचारिणीम् ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
ददौ तां समलङ्कृत्य कन्यां भृगुसुताय़ वै ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ तेभ्यः सहस्राणि गवां प्रत्येकशः प्रभुः |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ त्वष्टा महामाय़ौ स्कन्दाय़ानुचरौ वरौ ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
ददौ दुर्योधनो राजा पावकाय़ महात्मने ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
ददौ दुहितरं चास्मै रत्नानि विविधानि च |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
ददौ दुहितरं तस्मै च्यवनाय़ महात्मने ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ द्विजेभ्यः क्रतुदक्षिणाश्च; यदुप्रवीरो हलभृत्प्रतीतः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
ददौ धर्माय़ धर्मज्ञो दक्ष एव प्रजापतिः ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ पशुपतिस्तस्मै सर्वभूतमहाचमूम् |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ प्रतिश्रय़ं तस्मै सदा सर्वातिथिव्रती ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ प्रीतो महाराज धर्मराजो युधिष्ठिरः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ प्रीत्या कुमाराय़ दण्डं चैव वृहस्पतिः ||
४५ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ यत्र सहस्राणि प्रय़ुतानि च केशवः ||
१५ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ रत्नानि वासांसि ग्रामानश्वान्रथानपि |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ राजा समुद्दिश्य तय़ोर्मात्रोर्महीपतिः ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ श्राद्धानि विधिवद्दक्षिणावन्ति पाण्डवः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ स दश धर्माय़ कश्यपाय़ त्रय़ोदश |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ स दश धर्माय़ सप्तविंशतिमिन्दवे |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
गन्धर्व उवाच
ददौ स विश्वावसवे मह्यं विश्वावसुर्ददौ ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
ददौ संवरणस्यार्थे वसिष्ठाय़ महात्मने |
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
भीष्म उवाच
ददौ सुवर्णं विप्रेभ्यो व्यमुच्यत च किल्विषात् ||
६८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ स्कन्दाय़ राजेन्द्र सुरारिविनिवर्हणम् ||
२३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
ददौ हिरण्यं वासांसि गाश्चाश्वांश्च परन्तपः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
दद्यां वित्तं द्विजाग्र्येभ्यः शत्रूणां चापि दुर्जय़ः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
दद्यादतिथिपूजार्थं स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
दद्यादपश्च यः शक्त्या सर्वे तुल्यफलाः स्मृताः ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
दद्याद्द्विजेभ्यः स भवेदरोग; स्तथाभिरूपश्च नरेन्द्रलोके ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
दद्याद्राजा न याचेत यजेत न तु याजय़ेत् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
दद्याद्रिपोश्चापि हि धार्तराष्ट्रः; कुतो दाय़ाँल्लोपय़ेद्व्राह्मणानाम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
दद्याद्वापि यथाशक्ति तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
दद्याद्वै व्रतमुद्दिश्य सर्वान्कामान्समश्नुते ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
दद्यान्नित्यं च वित्तानि तथा मुच्येत किल्विषात् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२५
भीष्म उवाच
दद्यान्मर्मातिगं शोकं तं विद्याद्व्रह्मघातिनम् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
दधाति चेतसा सद्यः प्राणस्थानेष्ववस्थितः |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
दधाति प्रभवे स्थानं भूतानां संय़मो यमः |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
दधाति यः स्वकर्मणा धनानि यस्य कस्यचित् |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
दधाति सर्वमीशानः पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरन् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
दधाति सुकृताँल्लोकान्पुनाति च कुलं नरः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
दधार द्रोणमाय़ान्तं वेलेव सरितां पतिम् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
दधार पृथिवी चैनं विभ्रती रूपमुत्तमम् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
दधार युधि राजेन्द्रो यथा वर्षं महाद्विपः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
दधार यो रणे वाणान्द्रोणचापच्युताञ्शितान् ||
३० ख