वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
दमय़न्ती पुनर्वेश्म व्रीडिता प्रविवेश ह ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
दमय़न्ती भवेदेतत्कुर्याद्दुःखेन मोहिता |
४ क
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
दमय़न्ती महाराज वाहुकं वाक्यमव्रवीत् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
दमय़न्ती रहोऽभ्येत्य मातरं प्रत्यभाषत ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
दमय़न्तीं तथा दृष्ट्वा रुरोद निषधाधिपः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
दमय़न्तीं दमं दान्तं दमनं च सुवर्चसम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
दमय़न्तीति विख्यातां भर्तृदर्शनलालसाम् ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
दमय़न्तीमथो दृष्ट्वा प्रस्थिताः स्मेत्यथाव्रुवन् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
दमय़न्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यवादिनः ||
८६ ख
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
दमय़न्तीमपि पिता सत्कृत्य परवीरहा |
२ क
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
दमय़न्तीसकाशे त्वां कथय़िष्यामि नैषध |
२० क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
दमय़न्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुषा ||
९२ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्यपि कल्याणी निद्रय़ापहृता ततः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
७२
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्यपि कल्याणी प्रासादस्थान्ववैक्षत ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
दमय़न्त्यपि भर्तारमवाप्याप्याय़िता भृशम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
६६
सुदेव उवाच
दमय़न्त्या गतः सार्धं न प्रज्ञाय़त कर्हिचित् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्या तथोक्ता तु सा देवी भृशदुःखिता |
२ क
वन पर्व
अध्याय
७२
केशिन्यु उवाच
दमय़न्त्या वचः साधु निवोध पुरुषर्षभ ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्या व्रुवन्त्यास्तु सर्वमेतदरिन्दम |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
७६
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्या समाय़ुक्तं जहृषे च नराधिपः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्या सह नलो विजहारामरोपमः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्या सह श्रान्तः सुष्वाप धरणीतले ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
दमय़न्त्या सहोपेतं काल्यं द्रष्टा सुखोषितम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
दमय़न्त्यां विशङ्कां तां व्यपाकर्षदरिन्दमः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्याः पणः साधु वर्ततां यदि मन्यसे ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्याः प्रमुदिताः प्रतिजग्मुर्यथागतम् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
दमय़न्त्याः स्थितिर्यत्र नलस्य व्यसनागमे ||
१०९ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्यास्तदा व्यभ्रे नभसीव निशाकरः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्यास्तु तद्वाक्यं वार्ष्णेय़ो नलसारथिः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्येकवस्त्रा तं गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्विय़ात् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्यै ततः प्रादात्केशिनी कुरुनन्दन ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्यैवमुक्ता सा जगामाथाशु केशिनी |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
दमय़न्निव दम्यानां शश्वद्भारं प्रवर्धय़ेत् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
दरदं स्तुहि वाह्लीकमिमं पार्थिवसत्तमम् |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
दरदान्सह काम्वोजैरजय़त्पाकशासनिः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
दरदैश्चूचुपैश्चैव तथा क्षुद्रकमालवैः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
दरिद्र इति मत्वा वै गाधिः शत्रुनिवर्हणः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
दरिद्रं व्याधितं दीनमध्वना परिकर्शितम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
दरिद्रश्च परिक्लिष्टः शतवर्षो जनाधिप ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
दरिद्रश्चासवर्णश्च ममाय़मिति पार्थिवः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
दरिद्राणां तु राजेन्द्र अपि काष्ठं हि जीर्यते ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
जरत्कारुरु उवाच
दरिद्राय़ हि मे भार्यां को दास्यति विशेषतः |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
दरिद्रैर्मनुजैः पार्थ प्राप्यं यज्ञफलं यथा |
१३५ क
आदि पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
दरिद्रो दुःखशीलश्च पितृभिः संनिय़ोजितः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
दरीमेतां प्रविश त्वं शतक्रतो; यन्मां वाल्यादवमंस्थाः पुरस्तात् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
दर्पः क्रोधो मदः स्वप्नो हर्षः शोकोऽतिमानिता |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
दर्पजाः पितरं यस्त्वं द्रष्टा शवधरं तथा ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
अश्वत्थामो उवाच
दर्पमुत्सिक्तमेतत्ते फल्गुनो नाशय़िष्यति ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१३६
भरद्वाज उवाच
दर्पस्ते भविता तात वराँल्लव्ध्वा यथेप्सितान् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
दर्पस्यान्ते विहिते वेपमानः; पश्चान्मन्दस्तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ||
६० ख