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शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
सदेवलोके कृत्स्नेऽस्मिन्नान्यस्त्वत्तः पुमान्भवेत् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
सदेवासुरगन्धर्वं लोकं लोकविदां वरः |
३ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सदेवासुरगन्धर्वं सय़क्षोरगराक्षसम् |
६४ क
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
भीष्म उवाच
सदेवासुरगन्धर्वाः सर्षिकिंनरलेलिहाः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
सदेवासुरगन्धर्वैः सकिंनरमहोरगैः |
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
सदेवासुरगन्धर्वैर्लोकैरपि कथञ्चन ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
सदैत्ययक्षगन्धर्वपिशाचोरगराक्षसैः |
४६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
सदैव चिन्तय़न्तस्ते न निद्रामुपलेभिरे ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय ४४
कृप उवाच
सदैव तव राधेय़ युद्धे क्रूरतरा मतिः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
सदैव तु मय़ा तस्य चित्तज्ञेन गृहे जनः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
सदैव त्रिदिवं प्राप्तो राजा किल युधिष्ठिरः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१३
भीष्म उवाच
सदैव दमसंय़ुक्तस्तस्य भुङ्क्ते महत्फलम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
सदैव निकृतिप्रज्ञो द्वेष्टा माय़ोपजीवनः |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
सदैव प्रीतिमत्यासीत्तनय़ेषु निजेष्विव ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
सदैव भरतश्रेष्ठ मा ते भूदत्र संशय़ः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८५
विदुर उवाच
सदैव भावितो लोको गुणौघैस्तव पार्थिव |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
सदैव भ्रातृभिः सार्धमग्रजस्यारिमर्दन |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
सदैव याचमानेषु सत्सु दम्भविवर्जिषु |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
सदैव याचमानो वै तथा शाम्यति न द्विजः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
सदैव याजिनां यज्ञादात्मनीज्या निवर्तते ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
सदैव राज्ञा वोद्धव्यं सर्वलोकाद्युधिष्ठिर |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
सदैव शकुनास्तात मृगाश्चाधस्तथा गजाः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
सदैव सहदेवस्य भ्रातरो मधुसूदन |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
द्युमत्सेन उवाच
सदैव हि गुरोर्वृत्तमनुवर्तन्ति मानवाः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
सदैवोग्रतपा राजन्नग्न्यर्कसदृशद्युतिः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
सदैवोपहरेद्राजा सत्कृत्यानवमन्य च ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
वैशम्पाय़न उवाच
सदोगतास्तत्र ये वै सर्वभूतनमस्कृताः ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
सदोपभोज्याँल्लोभान्धो हिरण्यार्थे परन्तप |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
सदोपवासी च तथा नक्तभोजी तथा द्विज ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
सदोपवासी च भवेद्यो न भुङ्क्ते कथञ्चन ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
सदोपवासी च भवेद्व्रह्मचारी तथैव च ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
सदोपवासी च भवेद्व्रह्मचारी सदैव च |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
सदोपवासी भवति यो न भुङ्क्तेऽन्तरा पुनः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
सदोपस्पर्शनाच्चास्य वभूवुरमितौजसः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
सदोषं दर्शनं येषां संवासे सुमहद्भय़म् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्पराय़णः |
८८ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
जनमेजय़ उवाच
सद्धर्मगुणमाहात्म्यैरभिवर्धितमुत्तमम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
ऋषय़ ऊचुः
सद्भावनिरताश्चान्ये केचित्संशय़िते स्थिताः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रय़ुज्यते |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय ८२
यय़ातिरु उवाच
सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्या; त्सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात् |
१० क
वन पर्व
अध्याय २०५
व्राह्मण उवाच
सद्भिः पुरुषशार्दूल तथाहं भवता त्विह ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
सद्भिः सदा सत्पुरुषः स हतो द्वैरथे वृषः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
सद्भिः सदैवाचरितं समाधिं; चरन्ति पुत्रास्तव याज्ञसेनि ||
२३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
सद्भिः सह नरश्रेष्ठ प्रवदन्ति मनीषिणः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
सद्भिरध्यासिता धीरैः कर्मभिर्धर्मसेतवः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
सद्भिराचरितं पूर्वं यथावदनुय़ाय़िनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
सद्भिराचरितत्वात्तु वृत्तमेतदगर्हितम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
नारद उवाच
सद्भिरारोपितः स्वर्गं पार्थिवैर्भूरिदक्षिणैः |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
अध्वर्युरु उवाच
सद्भिरेवेह संवासः कार्यो मतिमतां वर |
२५ क