chevron_left  दानधर्मतपोय़ोगाच्छ्रिय़ाarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
दानधर्मतपोय़ोगाच्छ्रिय़ा परमय़ा युतः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
दानधर्मरताः पुंसः शूराश्चाहतलक्षणाः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
दानधर्मरताः सन्तः सततं प्रिय़वादिनः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
दानधर्माग्निना शुद्धास्ते स्वर्गं यान्ति भारत ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१४
भीष्म उवाच
दाननित्यः पवित्रश्च अस्वप्नश्च दिवास्वपन् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
दाननित्याः सुखाँल्लोकानाप्नुवन्तीह च श्रिय़म् ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
दानपथ्योदनो जन्तुः स्वकर्मफलमश्नुते ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
दानप्रदाः सुखं प्रेत्य प्राप्नुवन्तीह च श्रिय़म् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
दानमध्ययनं यज्ञं प्रजानां परिपालनम् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
दानमध्ययनं यज्ञः प्रजानां परिपालनम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
दानमध्ययनं यज्ञः प्रजासन्तानमार्जवम् ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
दानमध्ययनं यज्ञः शौचेन धनसञ्चय़ः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
दानमध्ययनं यज्ञस्तपो ह्रीरार्जवं दमः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
दानमध्ययनं यज्ञो धर्मय़ुक्तानि तानि तु ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
दानमध्ययनं यज्ञो योगः क्षेमो विधीय़ते |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
दानमध्ययनं यज्ञो लोभादेतत्प्रवर्तते |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
दानमल्पं न शक्यामि दातुं वित्तं च नास्ति मे ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
दानमार्जवमेतानि यदि स्युरफलानि वै ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
दानमीश्वरभावश्च क्षत्रकर्म स्वभावजम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
दानमुक्ताकरं भीमं शोणितह्रदविद्रुमम् ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१
देवस्थान उवाच
दानमेके प्रशंसन्ति केचिदेव प्रतिग्रहम् |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८५
वृहस्पतिरु उवाच
दानमेव हि सर्वत्र सान्त्वेनानभिजल्पितम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
दानवं घोरकर्माणं गवां मृत्युमिवोत्थितम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
दानवा निवसन्ति स्म शूरा दत्तवराः पुरा ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
दानवा राक्षसा नागास्तरक्ष्वृक्षवनौकसः |
१ ख
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
दानवा राक्षसाश्चैव गन्धर्वाः पन्नगास्तथा |
६ क
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
दानवानां मुहूर्ताच्च तमानीतं न्यवेदय़त् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
मातलिरु उवाच
दानवानां विनाशार्थं महास्त्राणां महद्वलम् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय २१८
स्कन्द उवाच
दानवानां विनाशाय़ देवानामर्थसिद्धय़े |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
दानवानां शरीरैश्च महद्भिः शोणितोक्षितैः |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३६
वैशम्पाय़न उवाच
दानवान्घोरकर्माणो निवातकवचान्युधि |
७ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
दानवान्प्रत्ययुध्यन्त शक्रं कृत्वा व्यपाश्रय़म् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
दानवान्भक्षय़न्तस्ते प्रपिवन्तश्च शोणितम् |
६९ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
दानवान्राक्षसांश्चैव गन्धर्वान्पन्नगांस्तथा |
५ क
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
दानवालय़मत्युग्रं प्रय़ातोऽस्मि युय़ुत्सय़ा ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
दानवाश्च पराभूता दैतेय़ी चासुरी प्रजा ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
दानवाश्च पिशाचाश्च राक्षसाश्च महावलाः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
दानवाश्च महावीर्या ये मनुष्यत्वमागताः |
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
दानवेन्द्रा महाकाय़ा महावीर्या वलोच्छ्रिताः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
दानवेन्द्रास्त्वतिक्रम्य तत्पितामहशासनम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
दानवैरभिसङ्कीर्णां घोररूपैर्महावलैः |
१० ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
दानवैरर्दितं सैन्यं देवानां विमुखं वभौ ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
दानवैरर्द्यमानास्तु देवा देवर्षय़स्तथा |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
दानवैर्युधि भग्नाः स्म तथैश्वर्याच्च भ्रंशिताः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
दानवो महिषो नाम प्रगृह्य विपुलं गिरिम् ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
नाचिकेत उवाच
दानव्युष्टिं तत्र दृष्ट्वा महार्थां; निःसन्दिग्धं दानधर्मांश्चरिष्ये ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
दानशीलं मृदुं दान्तं धर्मकाममनुव्रतम् |
१२ क