शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
दानशीलश्च सततं यज्ञशीलश्च भारत ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
दानशीलो भवेद्राजा यज्ञशीलश्च भारत |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भरद्वाज उवाच
दानस्य किं फलं प्राहुर्धर्मस्य चरितस्य च |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
दानाच्छेदे स्वय़ङ्कारी सुद्वारः सुखदर्शनः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
दानातिथ्यक्रिय़ाधर्मैर्यान्ति वैश्याश्च सद्गतिम् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
दानादानरतिर्यश्च स वै क्षत्रिय़ उच्यते ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
युधिष्ठिर उवाच
दानाद्वा सर्प सत्याद्वा किमतो गुरु दृश्यते |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
दानाध्ययनसम्पन्नास्ते वै पूज्यतमाः सदा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
दानाध्ययनय़ज्ञेज्या गुरुदैवतपूजनम् |
२९ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
दानानां च महावाहो फलं प्राप्नुहि पाण्डव ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
दानानामपि सर्वेषां गवां दानं प्रशस्यते |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
दानानामुत्तमं किं च किं च सत्रमतः परम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
दानानि च प्रय़च्छन्ति तप्यन्ति च तपो महत् ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
दानानि च यथाकालं द्विजेषु दद्युरेव ते ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
दानानि हि नरं पापान्मोक्षय़न्ति न संशय़ः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
दानान्न दुष्करतरं पृथिव्यामस्ति किञ्चन |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
व्रह्मो उवाच
दानार्थं वा व्राह्मणाय़ तत्रेदं श्रूय़तां फलम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
दाने कोशक्षय़ो ह्यस्य वैरं चाप्यप्रय़च्छतः |
१४४ क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
दाने च सत्यवाक्ये च गुरुशुश्रूषणे तथा |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
दाने तपसि शौर्ये च यस्य न प्रथितं यशः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
युधिष्ठिर उवाच
दाने तपसि सत्ये च मनो मे सततं भवेत् ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
दाने न कीर्तिर्भवति प्रेत्य चेह च दुर्मतेः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
दाने रतत्वं सत्यं च अहिंसा प्रिय़मेव च |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
दानेन कर्मणा चान्ये तपसान्ये तपस्विनः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
दानेन चानुग्रहणमस्पृहार्थे परार्थता |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
दानेन तपसा चैव सत्येन च युधिष्ठिर |
८३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
दानेन तपसा चैव सर्वपापमपोह्यते ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
दानेन तपसा यज्ञैरद्रोहेण दमेन च |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
दानेन तात प्रय़तोऽभूः सदैव; विशेषतो गोप्रदानं च कुर्याः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
दानेन दिव्यानभिवाञ्छामि लोका; न्सत्येनाथो व्राह्मणानां च गुप्त्या |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
दानेन भोग इत्याहुस्तपसा सर्वमाप्नुय़ात् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
दानेन भोगी भवति मेधावी वृद्धसेवय़ा |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
दानेनान्यं वलेनान्यं तथा सूनृतय़ापरम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
दानेनान्यं वलेनान्यमन्यं सूनृतय़ा गिरा |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
दानैः पृथग्विधैश्चापि यथा प्राहुर्मनीषिणः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
दानैर्यज्ञैश्च विविधैर्यथा दान्ताः क्षमान्विताः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
दान्तं जितेन्द्रिय़ं चापि शोको न स्पृशते नरम् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
दान्तं यच्च सभामध्ये आसनं रत्नभूषितम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
दान्तं वहुमतं लोके के शूराः पर्यवारय़न् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
दान्तः क्षान्तो देवतार्ची प्रशान्तः; शुचिर्वुद्धो धर्मशीलोऽनहंवाक् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
दान्तः क्षान्तो मृदुः क्षेमः प्रजाः पालय़ पार्थिव ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
दान्तः प्रीतमना नित्यं गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ||
३३ ग
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
दान्तः शमपरः शश्वत्परिक्लेशं न विन्दति |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
दान्तः सदा प्रिय़ाभाषी क्षमावांश्च विपर्यये ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
दान्तस्य किमरण्येन तथादान्तस्य भारत |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
दान्ता धर्मप्रधानाश्च न्याय़धर्मानुवर्तकाः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
दान्ताः शमपराश्चैव तान्नमस्यामि केशव ||
१८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
दान्ताः सर्वत्र सुखिनो दान्ताः सर्वत्र निर्वृताः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
दान्तानामपि यो दान्तो धीमतामपि या च धीः ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
दान्तान्कर्मसु सर्वेषु मुख्यान्मुख्येषु योजय़ेः ||
१४ ख