द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
दान्तान्वेदव्रतस्नातान्स्नातानवभृथेषु च |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
दान्तास्ताम्रारुणा युक्ताः शिखण्डिनमुदावहन् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
दान्ते शय़्यासने शुभ्रे जाम्वूनदविभूषिते |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
दान्तैरश्मकदाय़ादं त्वरमाणोऽभ्यहारय़त् |
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
दान्तैर्युक्तं सहदेवोऽधिरूढः; शिरांसि राज्ञां क्षेप्स्यते मार्गणौघैः ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
दान्तो मैत्रः क्षमाय़ुक्तः केशश्मश्रु च धारय़न् |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
दान्तो मैत्रः क्षमाय़ुक्तः सर्वभूतसमो मुनिः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
दान्तो विधेय़ो हव्यकव्येऽप्रमत्तो; अन्नस्य दाता सततं द्विजेभ्यः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
दान्तो व्राह्मणसत्कर्ता सर्ववर्णवुभूषकः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
दानय़ज्ञप्रजासर्गैरेते हि दिवमाप्नुवन् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
दापय़ित्वा करं धर्म्यं राष्ट्रं नित्यं यथाविधि |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
दामोदरो भ्रातरमुग्रवीर्यं; हलाय़ुधं वाक्यमिदं वभाषे ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
दामोष्णीषस्त्रैवणिश्च पर्णादो घटजानुकः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
दाम्भिको दुष्कृतप्राय़ः शूद्रेण सदृशो भवेत् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
माद्र्यु उवाच
दारकेष्वप्रमत्ता च भवेथाश्च हिता मम |
३० क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
दारकौ च हि मे नीतौ वसतस्तत्र वालकौ |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
दारा इत्युच्यते लोके नाम्नैकेन परन्तप |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
दारांश्च कुरु धर्मेण मा निमज्जीः पितामहान् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
दारांश्चैषां विमुञ्चध्वं धर्मराजस्य शासनात् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
दाराः पुत्राश्च भृत्याश्च भवन्तीह नरस्य वै ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
दारानवाप्य क्रतुभिर्यजन्ते; तेषामय़ं चैव परश्च लोकः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
दारान्मतङ्गो धर्मात्मा राजर्षिर्व्याधतां गतः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
दाराश्चास्य प्रवर्तन्ते यथाकाममचेतसः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
दारितश्च स वज्रेण महाय़ोगी महासुरः |
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
दारिता सहसा भूमिश्चकम्प च ननाद च ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
दारितान्द्रौणिना वाणैर्भृशं विक्षतविग्रहान् |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
दारिद्र्यं पातकं लोके कस्तच्छंसितुमर्हति ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
दारिद्र्यमिति यत्प्रोक्तं पर्याय़मरणं हि तत् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
दारुकं चाव्रुवं वीर मुहूर्तं स्थीय़तामिति ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
दारुकं प्राह कृष्णस्य युज्यतां रथ इत्युत ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
दारुकं रथमारोप्य येन राजाम्विकासुतः ||
३८ ग
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
दारुकं वाजिनश्चैव रथं च समवाकिरत् ||
४ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
दारुकश्चैव दाशार्हमूचतुर्यन्निवोध तत् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
दारुकश्चोदय़ामास वासुदेवस्य वाजिनः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
दारुकस्य सुतस्तं तु वाणवेगमचिन्तय़न् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
दारुकस्यानुजस्तूर्णं कल्पनाविधिकल्पितम् ||
७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
दारुकस्यानुजो भ्राता सूतस्तस्य प्रिय़ः सखा |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
दारुकात्मज मैवं त्वं पुनः कार्षीः कथञ्चन |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
दारुकानुगतः श्रीमान्विवेश शिविरं स्वकम् |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
धृतराष्ट्र उवाच
दारुकेण समाय़ुक्तं स्ववाहुवलदर्पितः |
७५ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
दारुकेणाहमुत्पन्नो यथावच्चैव शिक्षितः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय
४०
उत्तर उवाच
दारुको वासुदेवस्य यथा शक्रस्य मातलिः |
१७ क
मौसल पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
दारुकोऽपि कुरून्गत्वा दृष्ट्वा पार्थान्महारथान् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
दारुकोऽपि यथाकामं प्रय़यौ केशवान्तिकम् ||
८२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
दारुकोऽपि हय़ान्मुक्त्वा परिचर्य च शास्त्रतः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
दारुकोऽवेत्य सन्देशं श्रुत्वा शङ्खस्य च स्वनम् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
दारुणं ह्यशिवं नादं शिवा दक्षिणतः स्थिता |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
दारुणः काननोद्देशः कौशिकैरभिनादितः ||
९१ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
दारुणः क्रोशतीनां च रुदतीनां च योषिताम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
दारुणः क्षत्रधर्मोऽय़ं विहितो धर्मकर्तृभिः |
२२ क