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द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणेन प्रय़ातानामस्माकं प्राणदंस्तथा ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणेन वरूथिन्याः पार्थस्यारीन्विनिघ्नतः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
दक्षिणेन सरस्वत्या उत्तरेण दृषद्वतीम् |
१७५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
दक्षिणेन सरस्वत्याः स्वय़नं तीर्थमुत्तमम् |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षिणेनाथ वामेन कतरेण स्विदस्यति |
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८४
भीष्म उवाच
दक्षिणेनैव पार्श्वेन प्रभातसमय़े इव ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षिणेऽथार्जुनो धन्वी हली रामश्च सव्यतः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
भीष्म उवाच
दक्षिणो नापवादी स्यादाहूतो गुरुमाश्रय़ेत् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
महेश्वर उवाच
दक्षे शमदमोपेते निर्ममे धर्मचारिणि |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षेण यजता चापि गङ्गाद्वारे सरस्वती |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
दक्षैश्च परितो वीर भिषग्भिः कुशलैस्तथा |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
दक्षो दाक्षिण्यसम्पन्नो न स मोघं विहन्यते ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ४
तमृषय़ ऊचुः
दक्षो धृतव्रतो धीमाञ्शास्त्रे चारण्यके गुरुः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
महेश्वर उवाच
दक्षो नाम महाभागे प्रजानां पतिरुत्तमः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
दक्षोऽम्वरीषः कुकुरो रवतश्च महाय़शाः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
दक्षय़ज्ञापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
दग्धं तस्माद्रणे रामो वाहूंस्ते छेत्स्यतेऽर्जुन ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
दग्धः शस्त्रप्रतापेन स मय़ा युधि घातितः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
दग्धपक्षाक्षिचरणा विचेष्टन्तो महीतले |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
दग्धमेवानुदहति हतमेवानुहन्ति च |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १३७
वैशम्पाय़न उवाच
दग्धवान्पाण्डुदाय़ादान्न ह्येनं प्रतिषिद्धवान् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
दग्धवीर्या निरुत्साहा वभूवुर्गतचेतसः ||
१०७ ख
आदि पर्व
अध्याय ११६
माद्र्यु उवाच
दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदार्ये प्रिय़ं कुरु ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
दग्धस्थाणुप्रतीकाशो रक्ताक्षः कृष्णमूर्धजः |
१०२ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
दग्धस्यास्त्राग्निना पूर्वं कृष्णात्सञ्जीवनं पुनः ||
२०७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
दग्धा जतुगृहे चापि द्यूतेन च पराजिताः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
दग्धां माय़ां निहतं राक्षसं च; दृष्ट्वा हृष्टाः प्राणदन्कौरवेय़ाः ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
दग्धाः सहस्रशो दैत्या नादैः स्कन्दस्य चापरे ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
दग्धाद्रिकूटशृङ्गाभं भिन्नाञ्जनचय़ोपमम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
दग्धानेवं स्वके गेहे दग्धा इति ततो जनाः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ५२
सूत उवाच
दग्धास्तत्र महासत्रे व्रह्मदण्डनिपीडिताः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
दग्धुं तपो हि क्षीय़ेन्मे धक्ष्यामीति च पार्थिव ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
दग्धुकामः कुलं सर्वं कुशिकानां तपोधनः ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
दग्धुकामोऽभवद्विद्वानथ वै वागभाषत ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
दग्धुमर्हसि तं पापं ज्वलिते हव्यवाहने |
१९० क
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
दग्धुमैच्छश्च यत्कुन्तीं सपुत्रां त्वमनागसम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
दग्धेऽऽश्रमे महाराज कार्तवीर्येण वीर्यवान् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
दग्धैकदेशा वहवो निष्टप्ताश्च तथापरे |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
दग्धौ दग्धौ पुनः पादावुपावर्तय़तानघा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
दग्ध्वा कण्ठं तु तद्यातं तेन श्रीकण्ठता मम ||
८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २५
गान्धार्यु उवाच
दग्ध्वा गच्छन्ति पाञ्चाल्यं राजानमपसव्यतः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
दण्ड इत्यभिविख्यातः स आसीन्नृपतिः क्षितौ ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४
व्यास उवाच
दण्ड एव हि राजेन्द्र क्षत्रधर्मो न मुण्डनम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
दण्ड एव हि सर्वात्मा लोके चरति मूर्तिमान् ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डं च दण्डधारं च विजित्य पृथिवीपतीन् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
दण्डं च दूषय़ेदस्य पुरुषैराप्तकारिभिः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
दण्डं च समरे राजंश्चित्रं चित्राय़ुधं हरिम् ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
दण्डं चतुर्थं पश्यामि तेषु पापेषु नान्यथा ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
दण्डं दण्ड्येषु धर्मेण प्रणय़न्तोऽन्वपालय़न् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
दण्डं धर्मस्य गोप्तारं विष्णवे सत्कृतं ददौ ||
३६ ख