वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
दुःखशोकसमाविष्टौ वैदेहीहरणार्दितौ |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखशोकाभिसन्तप्तो न श्रोष्ये परुषा गिरः ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखशोकाभिसन्तप्तो भवेदिति महामतिः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५७
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखश्चाय़ं वने वासो मृगय़ाय़ां च जीविका |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
दुःखशय़्याश्च विविधा भूमौ च परिवर्तनम् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
दुःखसन्तप्तहृदय़ो दृष्ट्वा राजन्वलक्षय़म् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
दुःखसम्भावनां कृत्वा धारय़ित्वा स्वय़ं सुखम् |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखस्यान्ते नरव्याघ्राः सुखं त्वनुभवन्त्विमे ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
दुःखस्यान्तेन चानेन भवितव्यं हि नौ शुभे ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखस्यैतस्य महतो धार्तराष्ट्रकृतस्य वै |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखहर्षपरिक्लेशा वृष्णीनामभवंस्तदा ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखा भवेय़ुः संरव्धाः कौरवान्प्रति ते ध्रुवम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
दुःखाच्चाश्रूणि मुमुचे पितरं चेदमव्रवीत् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
दुःखात्त्रातुं सर्व एवोत्सहन्ते; परत्र शीले न तु यान्ति शान्तिम् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
दुःखात्सुदुःखं व्यसनं प्राप्तवानस्मि सञ्जय़ ||
३७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
दुःखादन्ये सुखादन्ये ध्यानमित्यपरे स्थिताः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखादपि सुखं न स्याद्यदि पुण्यफलक्षय़ः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
दुःखादान इहाढ्येषु स्यात्तु पश्चात्क्षमो मतः ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
दुःखादुद्विजते सर्वः सर्वस्य सुखमीप्सितम् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखाद्दुःखतरं प्राप्य म्रिय़ेय़मतथोचिता ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
दुःखाद्यन्तैर्दुःखमध्यैर्नरः शारीरमानसैः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखानां हि क्षय़ो नास्ति जाय़ते ह्यपरात्परम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखानामेव भोक्तारो न सुखानां कदाचन ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
दुःखानि वनवासे वा किं नु मे सुकृतं भवेत् ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
शल्य उवाच
दुःखानि हि महात्मानः प्राप्नुवन्ति युधिष्ठिर |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०८
गुरुरु उवाच
दुःखान्निःसरणं वेद स तत्त्वज्ञः सुखी भवेत् ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखान्यवारय़द्राजन्मैवमित्येव चाव्रवीत् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
दुःखान्येतानि जानीमो न सुखानि कदाचन |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
दुःखान्वितानिमान्क्लेशैर्नाहं योक्तुमिहोत्सहे ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
दुःखान्विताय़ास्तिष्ठन्त्याः सा रात्रिर्व्यत्यवर्तत ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
दुःखाभिज्ञो हि गुरुकुलवासस्य शिष्यान्परिक्लेशेन योजय़ितुं नेय़ेष ||
८४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
दुःखामर्षवशं प्राप्तो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
दुःखार्जितस्य तपसस्तस्मान्नेच्छामि ते व्ययम् ||
२६ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखार्तश्चाव्रवीद्राजा सुभद्रां पाण्डवाग्रजः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखार्ता भरतश्रेष्ठा निषेदुः सह कृष्णय़ा |
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखार्ताथो पृथां प्राप्य कुररीव ननाद ह ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
दुःखार्तानां स सर्वेषां शिवकृत्सततं शिवः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
दुःखार्तेषु प्रमत्तेषु नास्तिकेष्वलसेषु च |
४८ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखार्तो भरतश्रेष्ठ इदं वचनमव्रवीत् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
दुःखार्तो भरतश्रेष्ठ न किञ्चिद्व्याजहार ह ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
दुःखाय़ धार्तराष्ट्राणां प्रादुर्भूतो धनञ्जय़ः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखाय़ासभुजोऽत्यर्थं युक्तानप्युत्तमैर्गुणैः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखितः पादय़ोस्तस्य नेत्रजं जलमुत्सृजन् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
दुःखितस्यार्थमानाभ्यां द्रव्याणां प्रतिपादनम् |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
दुःखिता प्रेक्ष्य सञ्जल्पमकार्षीदृषिणा सह ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
दुःखिताः केचिदादाय़ वालमप्राप्तय़ौवनम् |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखितामथ तां दृष्ट्वा त ऊचुर्वै तपोधनाः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखितो भरतश्रेष्ठ तस्या रूपवलात्कृतः |
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८४
यय़ातिरु उवाच
दुःखे न तप्येन्न सुखेन हृष्ये; त्समेन वर्तेत सदैव धीरः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
दुःखेन चाधिगच्छन्ति भोजनं द्विजसत्तम ||
१७ ख