सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
दासानामय़ुतं चैव सदाराणां विशां पते ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
दासाश्च दास्यश्च सुमृष्टवेषाः; भोजापकाश्चाप्युपजह्रुरन्नम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
दासी ऋषिमनुप्राप्तं प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
देवय़ान्यु उवाच
दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामय़े |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
दासीदासमलङ्कारान्क्षेत्राणि च गृहाणि च |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
दासीदासमसङ्ख्येय़ं राज्योपकरणानि च ||
३२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
दासीदाससुसम्पूर्णं प्रभूतधनधान्यवत् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
दासीनामप्रजातानां शुभानां रुक्मवर्चसाम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
दासीपुत्रा ये च दासाः कुरूणां; तदाश्रय़ा वहवः कुव्जखञ्जाः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
वृषादर्भिरु उवाच
दासीभर्तुश्च दास्याश्च मनसा नाम धारय़ ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
दासीभावेन भोक्तुं मामीषुस्ते मधुसूदन |
५६ क
सभा पर्व
अध्याय
६३
कर्ण उवाच
दासीभूता प्रविश याज्ञसेनि; पराजितास्ते पतय़ो न सन्ति ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
दासीभूतास्मि पापानां सभामध्ये व्यवस्थिता ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२३
विनतो उवाच
दासीभूतास्म्यनार्याय़ा भगिन्याः पतगोत्तम |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
दासीभोगेन कृष्णां च भोक्तुकामाः सुतास्तव ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
दासीशतं च ते दद्यां दासानामपि चापरम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
दासीसहस्रं श्यामानां सुवस्त्राणामलङ्कृतम् |
३० क
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
दासोऽस्मीति त्वय़ा वाच्यं संसत्सु च सभासु च |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
दासोऽय़ं मुच्यतां राज्ञस्त्वय़ा पञ्चसटः कृतः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
पशुसख उवाच
दास्य एव प्रजाय़ेत सोऽप्रसूतिरकिञ्चनः |
७४ क
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
दास्यं च नोऽगमय़द्भीमसेन; यत्राभवच्छरणं द्रौपदी नः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
दास्यमेके निगच्छन्ति परेषामर्थहेतुना ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
दास्यमैश्वर्यवादेन ज्ञातीनां वै करोम्यहम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
२३
सूत उवाच
दास्याद्वो विप्रमुच्येय़ं सत्यं शंसत लेलिहाः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
ईश्वर उवाच
दास्यामि ते तदास्त्राणि यदा पूतो भविष्यसि |
१३५ क
वन पर्व
अध्याय
२८६
सूर्य उवाच
दास्यामि ते सहस्राक्ष कुण्डले वर्म चोत्तमम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
दास्यामि भवते कन्यामिति पूर्वं नभाषितम् |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
दास्यामि मत्स्यप्रवरानुष्यतामिह भारत ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
दास्यामि विवुधश्रेष्ठ कुण्डले वर्म चोत्तमम् |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
६
विराट उवाच
दास्यामि सर्वं तदहं न संशय़ो; न ते भय़ं विद्यति संनिधौ मम ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
११५
ऋचीक उवाच
दास्याम्यश्वसहस्रं ते मम भार्या सुतास्तु ते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
दाहः पुनः संश्रय़णे संस्थिते पात्रभोजनम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
दाहकाले खाण्डवस्य कुरुक्षेत्रं गतो ह्यसौ ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
दाहितश्च निरस्तश्च त्वामेवोपाश्रितः पुनः |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
दाहो जतुगृहस्यात्र हैडिम्वं पर्व चोच्यते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
दाहो मोहः श्रमश्चैव क्लमो ग्लानिस्तथा रुजा |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
दाहय़ामास विदुरो धर्मराजस्य शासनात् ||
४३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
दाहय़ामासुरव्यग्रा विधिदृष्टेन कर्मणा ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
दाय़ं च संविभागं च नित्यमेवानुमोदताम् ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
दाय़ं तु तस्मै विविधं शृणु मे गदतोऽनघ |
१ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
दाय़ादं मत्स्यराजस्य कुले जातं मनस्विनम् |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
दाय़ाद्यतां च धर्मेण सम्यक्तेषु समाचर ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
दाय़ाद्यलव्धैरर्थैर्यो गाः क्रीत्वा सम्प्रय़च्छति |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
दाय़ाद्या यस्य वै गावो न्याय़पूर्वैरुपार्जिताः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
दिक्षु प्रज्वलितास्याश्च व्याहरन्ति मृगद्विजाः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
दिक्षु शान्तासु घोराणि व्याहरन्ति मृगद्विजाः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
दिक्षु सर्वासु भूतानां चक्राते कदनं महत् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
दिक्षु सर्वास्वदृश्यन्त दाशार्हेण प्रचोदिताः ||
५२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
दिक्षु सर्वास्वदृश्यन्त शरीराणि शिरांसि च ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
दिक्षु सर्वास्वपश्याम द्रोणस्यामिततेजसः ||
२९ ख