अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
दिवं गच्छत वै क्षिप्रं मत्स्यैर्जालोद्धृतैः सह ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५६
भीष्म उवाच
दिवं गत्वा महाप्राज्ञौ विहरेतां यथासुखम् |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
दिवं गत्वा शरीरेण स्वेन राजन्यथामरः |
१३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
दिवं च भूमिं च समानय़न्निव; प्रिय़ां तनुं भानुरुपैति पावकम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
दिवं चोर्वीं च मध्यं च तस्माद्दामोदरो ह्यहम् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां च पृथिवी विभो |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देवी वसुन्धरा |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देवी वसुन्धरा |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
दिवं देवेन्द्र पृथिवीं चैव सर्वां; संवेष्टय़ेस्त्वं स्ववलेनैव शक्र |
२८ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
दिवं प्राप्तं वासवोऽथाश्विनौ च; रुद्रादित्या वसवश्चाथ विश्वे |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
दिवं प्राप्य तु ते धीराः कुर्वते वै ततस्ततः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
दिवं स्पृशति भूमिं च शव्दः पुण्यस्य कर्मणः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
दिवं स्पृशति भूमिं च शव्दः पुण्यस्य कर्मणः |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
दिवं हंसप्रय़ुक्तेन विमानेन स गच्छति |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
दिवः पतत्सु देवेषु स्थानेभ्यश्च महर्षिषु |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
दिवः प्रपतनं भानोरुर्व्यामिव महाद्युतेः |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
दिवः प्रह्रादमवसानमानय़ं; को मेऽसुखाय़ प्रहरेत मर्त्यः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
दिवः सम्प्राप्य जगतीं विश्वामित्रादजीजनत् ||
६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
दिवःस्पृक्सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरय़ोनिजः ||
७४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
दिवमाक्रामदाचार्यः सद्भिः सह दुराक्रमम् ||
३९ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
दिवमाचक्रमे चक्रं वृष्णीनां पश्यतां तदा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
दिवमाचक्रमे धीमान्पश्यतामेव नस्तदा ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
दिवमाचक्रमे वज्री सद्भिः सह दुरासदम् ||
६२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
दिवमावृत्य तिष्ठन्तं गिरिं भेत्स्यामि धारिभिः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
दिवश्चोल्काः पतन्त्येताः सनिर्घाताः सकम्पनाः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
दिवश्च्युता शिरसात्ता भवेन; गङ्गावनीध्रास्त्रिदिवस्य माला ||
८९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
दिवश्च्युतैर्भूरतिदीप्तिमद्भि; र्नक्तं ग्रहैर्द्यौरमलेव दीप्तैः ||
२० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
दिवसकरशशाङ्कवह्निदीप्तं; त्रिभुवनसारमपारमाद्यमेकम् |
९८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
दिवसप्रतिमा राजन्वभूव रणमूर्धनि ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
दिवसान्ते गुणानेतानभ्येत्यैकोऽवतिष्ठति ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
दिवसान्ते परिश्रान्ता विहृत्य च कुरूद्वहाः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
दिवसान्सुवहून्राजन्नुभय़ोर्जय़गृद्धिनोः ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
दिवसान्सुवहून्राजन्परस्परजिगीषय़ा ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
दिवसार्धं समभवन्मासेनैव समं नृप ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
दिवसे दिवसे कृत्वा भागं प्रागाह्निकं मम ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रार्थचक्षुषः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
दिवसे दिवसे तस्य वर्धते न तु हीय़ते ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
दिवसे दिवसे तेषां प्रतिवेलं च भारत |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
दिवसे दिवसे नाम रात्रौ रात्रौ सदा सदा |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
दिवसे दिवसे प्राप्ते भीष्मः शान्तनवो युधि |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
दिवसे दिवसे प्राप्ते भीष्मः शान्तनवोऽग्रणीः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ||
२० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ||
३१ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
दिवसे दिवसे ह्यस्या गतजल्पितचेष्टितम् |
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
दिवसे द्वादशे यस्तु प्राप्ते वै प्राशते हविः |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
दिवसे पञ्चमे यस्तु प्राश्नीय़ादेकभोजनम् |
१९ क