आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
दिविष्ठस्य भुविष्ठस्त्वं सखा भूत्वा मम प्रिय़ः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
दिवीव देवा व्रह्माणं युधिष्ठिरमुपासते ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
दिवीव नक्षत्रगणैः परिकीर्णो निशाकरः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
दिवीव पार्थ सूर्येण न शक्या चरितुं त्वय़ा ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
दिवे वै दर्शय़ामास तां गां गोवृषभेक्षण ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
गालव उवाच
दिवोदास इति ख्यातो भैमसेनिर्नराधिपः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
दिवोदासः पुरीं हित्वा पलाय़नपरोऽभवत् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
दिवोदासस्तु विज्ञाय़ वीर्यं तेषां महात्मनाम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
दिवोदासोऽथ धर्मात्मा समय़े गालवस्य ताम् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
दिवोदासोऽथ सुमना अम्वरीषो भगीरथः ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
दिवोल्काश्चापतन्घोरा राहुश्चार्कमुपाग्रसत् |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
दिवौकसश्चैव यतः प्रसूता; स्तदुच्यतां मे भगवन्पुराणम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
दिवौकसां पुष्करिणीं समासाद्य नरः शुचिः |
१०२ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
दिवौकसां महाराज न च ग्लानिररिन्दम ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२१
भीष्म उवाच
दिव्यं च विधिवच्चक्रे सोपचारं मुनेस्तदा ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
दिव्यं चक्षुः पश्य कुन्तीसुतांस्त्वं; पुण्यैर्दिव्यैः पूर्वदेहैरुपेतान् ||
३५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
दिव्यं चक्षुरपि प्राप्तं ज्ञानय़ोगेन वै पुरा ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
दिव्यं चक्षुरवाप्नोति प्रेत्य दीपप्रदाय़कः |
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
व्यास उवाच
दिव्यं चापमिषुधी चाददानं; हिरण्यवर्माणमनन्तवीर्यम् ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वय़मिन्द्रो युय़ोज ह ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यं तद्धनुरादाय़ खड्गं च पुरुषर्षभः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
दिव्यं ते चक्षुरुत्पन्नं स्वस्थं ते निर्मलं मनः |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यं तेजः समाविश्य प्रमीत इव सम्वभौ ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
दिव्यं दिव्यगुणोपेतं विमानमधिरोहति |
६७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यं धनुश्चेषुधी च स एनमनुय़ास्यति ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
दिव्यं माय़ामय़ं पुण्यं यत्तं मातलिना नृप ||
३१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२६
व्यास उवाच
दिव्यं मृष्टशलाकं तु सौवर्णं परमर्द्धिमत् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यं वपुः समास्थाय़ गतस्त्रिदिवमेव ह ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
दिव्यं वर्षसहस्रं तु पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ||
८६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
मातलिरु उवाच
दिव्यं वर्षसहस्रं ते चेरतुः परमं तपः |
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यं वर्षसहस्रं ते तपस्तप्त्वा तदुत्तमम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
दिव्यं वर्षसहस्रं वै सर्वे ते ऋषिभिः सह ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यं वर्षसहस्रं हि नरनाराय़णाश्रमे ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
दिव्यं वर्षसहस्रं हि पादेनैकेन तिष्ठतः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
दिव्यं वर्षसहस्रं हि विश्वामित्रेण धीमता |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
दिव्यं वर्षसहस्रं हि शाकेन किल सुव्रत |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
दिव्यं विमानमास्थाय़ हंसय़ुक्तं मनोजवम् ||
१४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
दिव्यं वैय़ाघ्रपद्यस्य उपमन्योर्महात्मनः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधे प्रिय़दर्शनः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
गङ्गो उवाच
दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधेऽद्भुतदर्शनः ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
दिव्यं संवत्सरं तत्र रमन्वै सुमहातपाः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यः पुरुष उत्पन्नो ज्वालावर्णो महावलः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
दिव्यकुण्डलसम्पन्ना दिव्याभरणभूषिता ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
दिव्यगन्धगुणोपेतो न पृथ्वीमस्पृशत्पदा ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यगन्धमुपादाय़ ववौ पुण्यश्च मारुतः |
८४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
दिव्यगन्धरसैः पुष्पैः फलैश्च भरतर्षभ ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२३
सूत उवाच
दिव्यगन्धवहैः पुण्यैर्मारुतैरुपवीजितम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यगन्धाधिवासेन व्यजनेन विधूय़ता ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
दिव्यचन्दनसंय़ुक्तं दिव्यधूपेन धूपितम् |
७ ख