आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८९
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्यासि पार्थ कुशली धन्यो राजा युधिष्ठिरः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्यासि राजन्निरुजो दिष्ट्या न ग्रहणं गतः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्याहं निहतः पापैश्छलेनैव विशेषतः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
दिष्ट्यैवं त्वं विजानासि दिष्ट्या ते वुद्धिरीदृशी |
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
दिष्ट्यैष तव वाणानां गोचरे परिवर्तते |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
दीक्षा वहुविधा राज्ञो वन्याश्रमपदं भवेत् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
दीक्षां चरति धर्मात्मा स नागैः सह मोदते ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षां यज्ञे पालनं युद्धमाहु; र्योगं राष्ट्रे दण्डनीत्या च सम्यक् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षां विवेश धर्मात्मा वाजिमेधाप्तय़े तदा |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५३
भीष्म उवाच
दीक्षाकाङ्क्षी तदा राजंश्च्यवनं भार्गवं श्रितः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षाकाले तु सम्प्राप्ते ततस्ते सुमहर्त्विजः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
दीक्षादमपरः शान्तः स्वाध्याय़परमः शुचिः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षितं चागतौ द्रष्टुमुभौ नारदपर्वतौ ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
जनमेजय़ उवाच
दीक्षितं चिररात्राय़ श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षितं विधिना तेन यतवाक्काय़मानसम् |
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षितः स तु धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१०५
लोमश उवाच
दीक्षितः सगरो राजा हय़मेधेन वीर्यवान् |
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
चण्डाल उवाच
दीक्षितश्च स राजापि क्षिप्रं नरकमाविशत् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षितश्चापि गान्धारिर्यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
भीष्म उवाच
दीक्षितैर्भरतश्रेष्ठ यताहारैः कृतात्मभिः ||
८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
दीक्षितो धार्तराष्ट्रोऽत्र पत्नी चास्य महाचमूः ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
दीक्षितो वै मुदा युक्तः स गच्छत्यमरावतीम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षितोऽद्यैव गच्छ त्वं द्रष्टुं देवं पुरन्दरम् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षय़स्व तदा मा त्वं त्वय़्याय़त्तो हि मे क्रतुः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षय़स्व त्वमात्मानं त्वं नः परमको गुरुः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
दीक्षय़ां चक्रिरे विप्रा राजसूय़ाय़ भारत ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
व्यास उवाच
दीनतो वालतश्चैव स्नेहं कुर्वन्ति वान्धवाः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
दीनश्चिन्तापरश्चैव तद्विद्धि भरतर्षभ ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०
सुरभिरु उवाच
दीनस्य तु सतः शक्र पुत्रस्याभ्यधिका कृपा ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
दीनस्वरा दूय़माना मानिनः शत्रुभिर्जिताः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
दीना इति हि मे वुद्धिरभिपन्नाद्य तान्प्रति ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
दीना दीनं स्थितं पार्थमव्रवीच्चाप्यधोमुखम् ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
दीनाननाथान्कौन्तेय़ परिरक्षसि नित्यशः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
दीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
दीनानामद्य तं शव्दं न शृणोमि समीरितम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
दीनान्धकृपणादिभ्यो दीय़मानेन चानिशम् |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
दीनान्धकृपणानां च गृहाच्छादनभोजनैः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
दीनान्धकृपणान्दृष्ट्वा भिक्षुकानतिथीनपि |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
दीनान्धकृपणे चापि तदा भरतसत्तम ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
दीनान्धकृपणेभ्यश्च तत्र तत्र नृपाज्ञय़ा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
दीनाभिपातिनो राजन्नात्र कार्या विचारणा ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
दीनामनाथां कृपणां विलपन्तीं नरेश्वर ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
दीनैः स्तनद्भिः परिवृत्तनेत्रै; र्महीं दशद्भिः कृपणं नदद्भिः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
दीनो यय़ौ नागपुरमश्वैर्वातसमैर्जवे ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
दीनोऽतिमात्रं त्वमिहाद्य किं नु; पृच्छामि त्वां क इहाद्यागतोऽभूत् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
दीपं प्रतिश्रय़ं चापि यो ददाति स धार्मिकः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
दीपदाता भवेन्नित्यं य इच्छेद्भूतिमात्मनः ||
५२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
दीपदाने प्रवक्ष्यामि फलय़ोगमनुत्तमम् |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
दीपप्रदः स्वर्गलोके दीपमाली विराजते ||
५० ख