भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
दिशः खं प्रदिशश्चैव नादय़न्भैरवस्वनः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
दिशः खं प्रदिशश्चैव भुवं च शरवृष्टय़ः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
दिशः पर्यपतच्चापं गाण्डीवमिव घोषवत् ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
दिशः प्रच्छादय़ामास प्रदिशश्च महारथः ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
दिशः प्रज्वलिता राजन्पांसुवर्षं पपात च |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
दिशः प्रज्वलिताः सर्वा नक्षत्राणि चलानि च |
७४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
दिशः प्रतिदिशो वापि तत्र जज्ञुः कथञ्चन ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
दिशः प्रतिष्ठमानानामस्तु शव्दो दिवं गतः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
दिशः प्रस्थापिताः सर्वे विनीता हरय़ो मय़ा |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
दिशः शरैः समावृण्वञ्शलभानामिव व्रजैः ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
दिशः सञ्छादय़न्वाणैः प्रदिशश्च महारथः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
दिशः सधूमाश्च भृशं प्रजज्वलु; र्महार्णवाश्चुक्षुभिरे च सस्वनाः ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
दिशः सप्रदिशः पार्थ सात्वतस्य च कारणात् ||
६२ ग
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
दिशः सम्पूरय़न्नादैर्महामेघरवोपमैः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
दिशः सम्प्राद्रवन्राजन्भय़ाज्जीवितकाङ्क्षिणः ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
दिशः सम्प्लावय़न्सर्वाः शरवर्षैः समन्ततः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
दिशः सर्वा वनान्तांश्च निरीक्ष्योवाच सत्यवान् ||
६६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
दिशः सर्वाः समभ्यस्य व्यधमत्पवनात्मजः ||
७५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
दिशः सर्वाः समभ्यस्य व्यधमत्पाण्डुनन्दनः ||
१०० ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
दिशः सर्वाः समालोक्य कठिने दृष्टिमादधे ||
१०१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
वासुकिरु उवाच
दिशश्च न प्रजानामि व्रह्मदण्डनिपीडितः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
दिशश्च न प्रजानीमो गन्तुं चैव न शक्नुमः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
दिशश्च प्रदिशश्चैव कम्पय़ानांश्च मेदिनीम् |
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
दिशश्च प्रदिशश्चैव परिवारं रथस्य हि ||
६९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
दिशश्च विदिशश्चैव क्षितिः सर्वे महीरुहाः ||
२७ ग
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
दिशश्च विमला जज्ञुस्तस्मिन्रजसि शामिते ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
दिशश्च विमलाः सर्वाः सम्वभूवुर्जनेश्वर ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
दिशश्च सैन्यं च शितैरजिह्मगैः; परस्परं प्रोर्णुवतुः स्म दंशितौ ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
दिशश्चतस्रः सहसा प्रधाविता; गजेन्द्रवेगं तमपारय़न्ती ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
दिशश्चतस्रश्चतुरश्च वर्णा; श्चतुष्पदा गौरपि शश्वदुक्ता ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
दिशश्चोपदिशश्चैव सर्वं कृष्णे प्रतिष्ठितम् ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
दिशस्तथा मही चैव तथा सर्वे महीधराः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
दिशस्तिस्रो विचित्याथ न तु ये दक्षिणां गताः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
दिशस्तीर्थानि शैलांश्च शृणु मे गदतो नृप ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
दिशां च प्रदिशां चोर्ध्वा दिग्जाता प्रथमं तथा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
दिशागजं तु श्वेताख्यं श्वेताजनय़दाशुगम् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०७
लोमश उवाच
दिशागजविषाणाग्रैः समन्ताद्घृष्टपादपम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
दिशापालं सुधर्माणमध्यापय़त भारत |
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२३
जनमेजय़ उवाच
दिशामभिजय़ं व्रह्मन्विस्तरेणानुकीर्तय़ |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
दिशामुदीची विप्राणां सोमो राजा प्रतापवान् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
दिशो जग्मुर्महानागाः केचिदेकचरा इव ||
४८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
दिशो दश व्याहरतां मोक्षं त्यक्तुं मनो दधे ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
दिशो न जाने न लभे च शर्म; प्रसीद देवेश जगन्निवास ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
दिशो भुजौ रविश्चक्षुर्वीर्ये शक्रः प्रतिष्ठितः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
दिशो भेजेऽथ सम्भ्रान्तं त्रासितं दृढधन्विभिः ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
संवर्त उवाच
दिशो वज्रं व्रजतां वाय़ुरेतु; वर्षं भूत्वा निपततु काननेषु |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
दिशो विचरतस्तस्य सर्वाश्च प्रदिशस्तथा |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
दिशो विजय़ता राजञ्श्वेतवाहेन भारत ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
दिशो विदुद्रुवुः सर्वा धनञ्जय़शरार्दिताः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५३
सञ्जय़ उवाच
दिशो विध्वंसय़ामास तदद्भुतमिवाभवत् ||
२० ख