आदि पर्व
अध्याय
२४
सूत उवाच
स तान्निषादानुपसंहरंस्तदा; रजः समुद्धूय़ नभःस्पृशं महत् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
नकुल उवाच
स तान्प्रगृह्य भुक्त्वा च न तुष्टिमगमद्द्विजः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
स तान्प्रति महाराज चिक्षिपे पञ्च साय़कान् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
स तान्प्रत्यर्चय़ामास राक्षसान्भीमविक्रमान् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
स तान्प्रमृद्याभ्यपतत्पुनरेव युधिष्ठिरम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९६
जनमेजय़ उवाच
स तान्प्रसादय़ामास शापस्यान्तो भवेदिति |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
स तान्यतिमनोज्ञानि विहङ्गाभिरुतानि वै |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
स तान्यथावत्प्रतिभाष्य शक्रः; सञ्चोदय़न्नहुषस्यान्तरेण |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
स तान्यनीकानि निवर्तमाना; न्यालोक्य पूर्णौघनिभानि पार्थः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
स तान्यनीकानि महाधनुष्मा; ञ्शिनिप्रवीरः सहसाभिपत्य |
७७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
स तान्रथवरान्राजन्नभ्यतिक्रामदर्जुनः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
स तान्वहति कौन्तेय़ नभसः परमां गतिम् ||
७२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स तान्विद्ध्वा शितैर्वाणैर्विमुखीकृत्य चार्जुनिः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
स तान्विद्राव्य कौन्तेय़ः सङ्ख्येऽमित्रान्दुरासदः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तान्सर्वांस्तुष्टाव एभिर्मन्त्रवादश्लोकैः ||
१४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
स तान्सर्वान्महाराज भ्राजमानान्पृथक्पृथक् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
स तान्सर्वान्सहानीकान्महाराज महारथान् |
१११ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
स ताभिः सह धर्मात्मा प्रेतकृत्यमनन्तरम् |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
स ताभ्यां शुशुभे राजा पत्नीभ्यां मनुजाधिप |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स ताभ्यां सहितः पार्थो रथप्रवरमास्थितः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
स तामपृच्छत्कार्त्स्न्येन व्यसनोत्पत्तिमादितः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
स तामप्सरसं दृष्ट्वा रूपेणान्येन संवृताम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
स तामवस्थां सम्प्राप्य कृष्णां प्रेक्ष्य सभागताम् |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
स तामसो मधुर्जातस्तदा नाराय़णाज्ञय़ा |
२३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
स तामापदमासाद्य दिव्यमस्त्रमुदीरय़त् ||
१७ ग
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
स तामामन्त्र्य सुश्रोणीं पुष्पकेतुशराहतः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
स तामाश्वासय़त्कन्यां दृष्टान्तागमहेतुभिः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
स तामुद्धृत्य मञ्जूषामुत्सार्य जलमन्तिकात् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
स तामुपादाय़ विजित्य रङ्गे; द्विजातिभिस्तैरभिपूज्यमानः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तामुवाच |
११७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
स तामृषिस्ततः क्रुद्धो वाक्यमाह शुभाननाम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
स तामेकां निशां गोभिः समसख्यः समव्रतः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
स तामैश्वर्ययोगस्थां वुद्धिं शक्तिमतीं सतीम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
स ताम्रनय़नः क्रोधाच्छ्वसन्निव महोरगः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
स तार्यमाणो यमुनां मामुपेत्याव्रवीत्तदा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
स तारय़ति तत्काष्ठं स च काष्ठेन तार्यते ||
६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स तालकेतोस्तीक्ष्णेन केतुमाहत्य पत्रिणा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
स तावत्प्रोच्यते धर्मो यावन्न प्रतिलङ्घ्यते ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
स तावामन्त्रय़ामास सर्वकामैरतन्द्रितः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
स तावुवाच तेजस्वी सहितौ रामलक्ष्मणौ |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
स तासामिष्ट एवासीन्न तथान्ये निजाः सुताः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
स तीक्ष्णविषदिग्धेन शरेणातिवलात्कृतः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
स तीर्त्वा दुस्तरं वीरो द्रोणानीकमहार्णवम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
स तीव्रं कोपमास्थाय़ रथे समरदुर्मदः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
स तीव्रं तप आस्थाय़ प्रसादय़ितवान्भवम् |
१३२ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स तीव्रगन्धसन्तप्तो देवदूतमुवाच ह |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स तु कर्णस्य तद्दिव्यमस्त्रमस्त्रेण शातय़न् |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
स तु कामपरीतात्मा तं शापं नान्ववुध्यत |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
स तु कामाग्निसन्तप्तः सुदेष्णामभिगम्य वै |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
स तु कामान्मृगो राजन्नासाद्यासाद्य तं नृपम् |
१४ क