chevron_left  दिशोarrow_drop_down
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
दिशो विप्रेक्षते सर्वास्त्वदर्थमिति मे मतिः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
दिशोऽवलोकय़ामास वेलां चैव दुरात्मवान् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्टं चाप्यनुपश्यैतत्खाण्डवस्य विनाशनम् ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
दिष्टं तेन हि तत्सर्वं यथा कर्णो निपातितः ||
९८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
दिष्टं वलीय़ इति मन्यमाना; स्ते पण्डितास्तत्सतां स्थानमाहुः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
दिष्टं वलीय़ इति मन्यमानो; न सञ्ज्वरेन्नापि हृष्येत्कदाचित् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्टं हि राजशार्दूल न शक्यमतिवर्तितुम् ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
दिष्टद्वारो लभेद्द्वारं न च राजसु विश्वसेत् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
दिष्टभावं गतस्यापि विघसे मोदते प्रजा ||
३४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
कृप उवाच
दिष्टमुत्सृज्य कल्याणं करोति वहुपापकम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २
व्यास उवाच
दिष्टमेतत्पुरा चैव नात्र शोचितुमर्हसि |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
श्रीकृष्ण उवाच
दिष्टमेतत्पुरा देवैर्भविष्यत्यवशस्य ते |
९२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
दिष्टमेतत्पुरा नूनमेवम्भावि नराधिप ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
दिष्टमेतत्पुरा मन्ये कथय़स्व यथेच्छकम् ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
यक्ष उवाच
दिष्टमेतत्पुरा मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम् |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्टमेतत्पुरा मन्ये भविष्यति न संशय़ः ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्टमेतद्ध्रुवं मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम् ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
धृतराष्ट्र उवाच
दिष्टमेव कृतं मन्ये पौरुषं तु निरर्थकम् ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्टमेव परं मन्ये पौरुषं चाप्यनर्थकम् |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
धृतराष्ट्र उवाच
दिष्टमेव परं मन्ये पौरुषादपि सञ्जय़ |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १९०
द्रुपद उवाच
दिष्टस्य ग्रन्थिरनिवर्तनीय़ः; स्वकर्मणा विहितं नेह किञ्चित् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
दिष्टान्तं प्राप धर्मात्मा समय़े पुरुषर्षभ ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या कलिङ्गराजश्च राजपुत्रश्च केतुमान् |
११२ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या कालस्य महतः प्रिय़ाः प्राणा हि देहिनाम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या कुशलिनः सर्वे पाण्डवाः सह वान्धवैः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या कुशलिनौ चेमौ भीमसेनधनञ्जय़ौ |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
दिष्ट्या कृतार्थं पश्यामि भवन्तमिह वै द्विज ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या गतस्त्वमानृण्यं मातुः कोपस्य चोभय़ोः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च पाण्डवश्च वृकोदरः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च भीमसेनश्च पाण्डवः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च भीमसेनश्च पाण्डवः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या च कुशली वीरः सात्यकिः सत्यविक्रमः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६
शल्य उवाच
दिष्ट्या च त्वां कुशलिनमक्षतं च; पश्यामो वै निहतारिं च शक्र ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
दिष्ट्या च दुष्कृतं कर्म दमय़न्त्याः क्षय़ं गतम् |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
दिष्ट्या च ध्रिय़से राजन्सदारोऽरिनिवर्हण ||
१२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १७
शल्य उवाच
दिष्ट्या च नहुषो भ्रष्टो देवराज्यात्पुरन्दर |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या च निर्जिताः सङ्ख्ये पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः ||
२९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या च निहतः पापः सैन्धवः पुरुषाधमः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या च निहतः पापो वृद्धक्षत्रः सहात्मजः ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या च पारितं कृच्छ्रमज्ञातं वै दुरात्मभिः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १७१
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या च भगवान्स्थाणुर्देव्या सह परन्तप |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १७१
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या च लोकपालैस्त्वं समेतो भरतर्षभ |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय ३२
व्रह्मो उवाच
दिष्ट्या च वुद्धिर्धर्मे ते निविष्टा पन्नगोत्तम |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या च वोऽहं पश्यामि मुक्तानस्माज्जनक्षय़ात् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
दिष्ट्या च व्यंसिता शक्तिरमोघास्य घटोत्कचे ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या च सन्धिकामास्ते भ्रातरः कुरुनन्दनाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
वासुदेव उवाच
दिष्ट्या च सफलाः पार्थ सर्वे कामा हि कामिताः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १७१
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या चाराधितो राजा देवानामीश्वरः प्रभुः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
दिष्ट्या चासि पुनः प्राप्तो न हि ते मानुषं वपुः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या चास्मि हतो युद्धे निहतज्ञातिवान्धवः ||
२५ ख