chevron_left  दीपवद्विप्रकृष्टत्वादणूनिarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
दीपवद्विप्रकृष्टत्वादणूनि सुमहान्त्यपि ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
दीपवृक्षैश्च सौवर्णैरभीक्ष्णमुपशोभितः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
दीपहर्ता भवेदन्धस्तमोगतिरसुप्रभः |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
दीपाः सर्वस्य लोकस्य चक्षुश्चक्षुष्मतामपि ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
दीपादन्ये यथा दीपाः प्रवर्तन्ते सहस्रशः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
दीपालोकप्रदानेन चक्षुष्मान्भवते नरः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
दीपिकाग्निकृतालोकस्तस्माद्रङ्गाद्विनिर्ययौ ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
दीपोपमानि भूतानि यावदर्चिर्न नश्यति ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
दीप्तं प्राहिणवं घोरमशुष्यत्तेन तज्जलम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
दीप्तधारः सुरौद्रास्यः सर्पकण्ठाग्रवेष्टितः |
१३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४२
व्रह्मो उवाच
दीप्तमग्निं जुह्वति च गुरूणां वचने स्थिताः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
दीप्तसूर्याग्नितेजोभिर्दिव्यमालाभिरेव च |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०२
भीष्म उवाच
दीप्तस्फुटितकेशान्ताः स्थूलपार्श्वहनूमुखाः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
दीप्तां प्रभां प्राजनय़न्त तत्र; तपात्यये विद्युदिवान्तरिक्षे ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
दीप्ताः शिवाश्चाप्यनदन्घोररूपाः सुदारुणाः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
दीप्ताक्षं भीषणं रक्षः सोल्मुकं प्रत्यदृश्यत ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्ताक्षेणातिताम्रेण लिहन्तं सृक्किणी मुहुः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्ताक्षो दीप्तजिह्वश्च दीप्तव्यात्तमहाननः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
दीप्ताङ्गदो दीप्तकिरीटमाली; वद्धस्रगुष्णीषनिवद्धखड्गः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ४९
आस्तीक उवाच
दीप्तादग्नेः समुत्पन्नं नाशय़िष्यामि ते भय़म् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४७
भीष्म उवाच
दीप्तानलनिभः प्राह भगवान्धूम्रवर्चसे |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
दीप्तामथैनां महता वलेन; सविस्फुलिङ्गां सहसा पतन्तीम् |
४१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
दीप्तास्यनय़नाश्चात्र नैकपादशिरोभुजाः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
दीप्ताय़ां दिशि गोमाय़ुर्दारुणं मुहुरुन्नदत् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
दीप्ताय़ां दिशि राजेन्द्र मृगाश्चाशुभवादिनः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्ताय़ां दिशि वित्रस्ता रौति तस्याश्रमस्य ह ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्तिकान्तिद्युतिगुणैः सूर्येन्दुज्वलनोपमः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
दीप्तिमग्नेः प्रभां मेरोः प्रतापं तपनस्य च |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
उमो उवाच
दीप्तिमन्तः कय़ा चैव चर्ययाथ भवन्ति ते ||
३४ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
भीमसेन उवाच
दीप्तेऽग्नौ सहितौ वाहू निर्दहेय़ं वलादिव ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
दीप्तो ज्वालैरनेकाभैरग्निरेकोऽथ वीर्यवान् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्तोर्ध्वकेशः पिङ्गाक्षः पिवन्प्राणभृतां वसाम् ||
३३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्तय़ोरस्त्रय़ोर्मध्ये स्थितौ परमतेजसौ ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
दीप्यते त्वेव लोकेषु शनैरपि सुभाषितम् ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
दीप्यते नाकपृष्ठस्था भासय़न्तीव भास्करम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
दीप्यन्तमिव शस्त्रार्च्या मत्तवारणविक्रमम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमानं महाशूलं प्रगृह्य मणिमानपि |
६५ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
दीप्यमानं यथा सूर्यस्तेजसा भरतर्षभ ||
२० ग
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
दीप्यमानं श्रिय़ा राजंस्तेजसा वपुषा तथा |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
दीप्यमानं श्रिय़ा वीरं शक्रादनवमं वले |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
दीप्यमानं श्रिय़ा व्राह्म्या क्रममाणं च सर्वशः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमानं श्रिय़ा व्राह्म्या दीप्ताग्निसमतेजसम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमानं स्ववपुषा अर्चिष्मन्तमिवानलम् ||
७० ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमानं स्ववपुषा दिव्यैरस्त्रैरुपस्थितम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानमपश्याम तेजसा वानरध्वजम् ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानमिवाकाशे गाण्डीवं समदृश्यत ||
११३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमाना महाशक्त्यो जग्मुराधिरथिं प्रति ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
दीप्यमाना महोल्केव तिष्ठत्यस्य हि वासवी |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय २०८
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमाना श्रिय़ा राजन्दिव्यरूपा मनोरमा ||
११ ग