कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानां महावेगां महोल्कां ज्वलितामिव ||
२९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानाः प्रदीपाश्च रथवारणवाजिषु |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
नारद उवाच
दीप्यमानानि दृश्यन्ते सर्वप्रहरणान्युत ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानाश्च सम्पेतुर्दिवि सप्त महाग्रहाः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१७
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमाने ततः प्रास्यत्प्रहसन्कृष्णवर्त्मनि ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५१
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानेन वपुषा रथेनादित्यवर्चसा |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानेव वै राजन्ससृजे पावकार्चिषः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
दीप्यमानेषु दीपेषु शय़नं प्रविवेश ह ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानैः परिक्षिप्ता दावैरिव महाद्रुमाः ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
दीप्यमानोऽग्निवन्नित्यं प्रभय़ा भरतर्षभ ||
७९ ग
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
दीप्यमानोऽप्यमित्रघ्न शीतोऽग्निरभवत्ततः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
दीप्यमानौ महात्मानौ प्राणय़ोर्युद्धदुर्मदौ ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
विदुर उवाच
दीप्यमानौषधिगणं सिद्धगन्धर्वसेवितम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
दीपय़न्ति महात्मानः सूक्ष्ममात्मानमात्मना |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
दीपय़न्तीव तापेन शंसन्तीव महद्भय़म् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
दीपय़न्तो दिशः सर्वा ज्वलद्भिरिव पावकैः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
दीपय़ामास तत्सैन्यं पाण्डवस्य महात्मनः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
दीर्घं कालमपि सम्पीड्यमानो; विद्युत्सम्पातमिव मानोर्जितः स्यात् ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
दीर्घं दध्यौ शान्तनवो योद्धुकामोऽर्जुनं रणे ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घं ध्याय़सि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
दीर्घं विप्रोषितः कालमरण्ये जटिलोऽजिनी |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
दीर्घः कालो व्यतिक्रान्तस्ततस्तस्यागमत्पिता ||
४१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
दीर्घकालं तपस्तप्तं न मे मरणतो भय़म् ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय
८
नारद उवाच
दीर्घकालं तपस्तप्त्वा निर्मिता विश्वकर्मणा ||
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
दीर्घकालं तपस्तेपे मग्नोऽम्भसि महातपाः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
दीर्घकालं परिश्रान्त ऋषिर्देवर्षिसंमतः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घकालं प्रदीप्तानि पापानां क्षुद्रकर्मणाम् ||
१०६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
दीर्घकालं हिमवति गङ्गाय़ाश्च दुरुत्सहाम् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
दीर्घकालधृतं गर्भं सुषाव न तु तं यदा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
दीर्घकालमपि क्षान्त्वा विहन्यादेव शात्रवान् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
दीर्घकालार्जितं क्रोधं मोक्तुकामं त्वय़ि ध्रुवम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
दीर्घकालेन तपसा सेवितेन तपोवने |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
दीर्घकालेन संसिक्तं विषमाशीविषो यथा |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
दीर्घकालोषितो राजंस्तत्र चित्रतनूरुहः ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घग्रीवा दीर्घनखा दीर्घपादशिरोभुजाः |
९९ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घजिह्वस्तु कौरव्य य उक्तो दानवर्षभः |
३७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
दीर्घदर्शी कृतप्रज्ञः सदा वैश्रवणो यथा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
दीर्घदर्शी महोत्साहः स्थूललक्ष्यो महावलः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घदर्शी शमपरः कुरूणां च हिते रतः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घनख्यो दीर्घदन्त्यो दीर्घतुण्ड्यश्च भारत |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घप्रज्ञ इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
दीर्घप्रज्ञाय़ मल्लाय़ रोचमानाय़ चाभिभो ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
दीर्घमन्युरनेय़श्च पापात्मा निकृतिप्रिय़ः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
दीर्घमाय़ुरवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
युधिष्ठिर उवाच
दीर्घमाय़ुरवाप्याथ कथं मृत्युमतिक्रमेत् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
दीर्घमाय़ुर्धनं पुत्रान्सम्यगाराधिताः शुभाः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
मार्कण्डेय़ उवाच
दीर्घमाय़ुश्च कौन्तेय़ स्वच्छन्दमरणं तथा ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य चिन्तय़ित्वा पराभवम् ||
४९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य चिन्तय़ित्वा मुहुर्मुहुः ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य पाण्डवानन्वचिन्तय़न् |
४ क