शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विकृत उवाच
दीय़तामित्यनेनोक्तं ददानीति तथा मय़ा |
९९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
दीय़तामुपधानं वै यद्युक्तमिह मन्यसे ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
दीय़ते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
दीय़ते भोजनं राजन्नतीव गुणवत्प्रभो |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
भीष्म उवाच
दीय़ते यच्च लभते दत्तं यच्चानुमन्यते |
९९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
दीय़ते वचनाद्राज्ञः कुन्तीपुत्रस्य धीमतः ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
दीय़न्तां ग्रामकाः केचित्तेषां वृत्त्यर्थमीश्वर |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
दीय़मानं तदा विप्राः प्रभूतमिति चाव्रुवन् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
दीय़मानं न गृह्णासि ऋणं कस्मात्त्वमद्य वै |
९८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विरूप उवाच
दीय़मानं यदि मय़ा नेषिष्यसि कथञ्चन |
१०२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखं कमलपत्राक्षी महर्षेः प्रिय़काम्यया ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
दुःखं करोति तत्तीव्रं यथाशा विहता मम ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
दुःखं च काले सहते जितात्मा; धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः ||
८८ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः सम्प्रवर्तते ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
दुःखं चानिष्टसंवासो दुःखमिष्टविय़ोगजम् ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
दुःखं चैव कुटुम्वार्थे यः पश्यति स मुच्यते ||
४३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
दुःखं छेत्स्यामि तेऽहं वै मय़ि वर्तस्व पुत्रिके |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
दुःखं जरा व्रह्मदत्त दुःखमर्थविपर्ययः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
दुःखं जीवन्सहामात्यो भवितव्यं हि तत्तथा ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
दुःखं तत्र न कुर्वीत हन्यात्पूर्वापकारिणम् ||
५२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
दुःखं नूनं कुरुश्रेष्ठ चरिष्यामो महीमिमाम् |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
दुःखं नूनं कृतान्तस्य गतिं ज्ञातुं कथञ्चन |
१५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
दुःखं नूनं भविष्यामि विचरन्पृथिवीमिमाम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
युधिष्ठिर उवाच
दुःखं प्राणपरित्यागः पुरुषाणां महामृधे |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
दुःखं प्राप्तं परं घोरमेतदिच्छामि वेदितुम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखं मामनुसम्प्राप्तं राजंस्त्वद्विप्रय़ोगजम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
दुःखं विद्यादुपादानादभिमानाच्च वर्धते |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
भीमसेन उवाच
दुःखं शोकं च निर्धूय़ याज्ञसेनि शुचिस्मिते ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
दुःखं संसारचक्रं च नरः क्लेशं च विन्दति ||
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखं सन्धारय़न्तः स्म नष्टसञ्ज्ञा इवाभवन् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
दुःखं सुखेन सततं जनाद्विपरिवर्तते ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
दुःखं हि मृत्युर्भूतानां जीवितं च सुदुर्लभम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अकृतव्रण उवाच
दुःखद्वय़मिदं भद्रे कतरस्य चिकीर्षसि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
दुःखप्रलापानार्तस्य तस्मान्मे क्षन्तुमर्हसि ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
दुःखमर्थगुणैर्हीनं तेनासि हरिणः कृशः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
दुःखमर्था हि त्यज्यन्ते पालने न च ते सुखाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
दुःखमासादितं घोरं प्राप्तश्चाभ्युदय़ः पुनः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
दुःखमित्येव यत्कर्म काय़क्लेशभय़ात्त्यजेत् |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
दुःखमूलं पराधीनं भृशमप्रिय़भागि च ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
युधिष्ठिर उवाच
दुःखमेतच्छरीराणां धारणं कुरुसत्तम ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
दुःखमेतत्तु यद्द्वेष्टा कर्ताहमिति मन्यते ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
दुःखमेतादृशं प्राप्तो नलः परपुरञ्जय़ः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखमेव कुतः सौख्यं राज्यभ्रष्टस्य भारत ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखमेवास्ति न सुखं तस्मात्तदुपलभ्यते |
२२ क
विराट पर्व
अध्याय
८
द्रौपद्यु उवाच
दुःखशीला हि गन्धर्वास्ते च मे वलवत्तराः ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
दुःखशीलो हि धर्मात्मा कथं नास्यापराध्नुय़ाम् ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
दुःखशोकमय़ैर्घोरैः सङ्गस्नेहसमुद्भवैः |
२७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखशोकसमाविष्टश्चिन्ताव्याकुलितेन्द्रिय़ः ||
४९ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखशोकसमाविष्टो निःश्वासपरमोऽभवत् ||
६२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखशोकसमाविष्टौ माद्रीपुत्राविमौ तथा ||
२७ ख