वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखेन चाधिगम्यन्ते तेषां नाशं न चिन्तय़ेत् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
दुःखेन चाधिगम्यन्ते नाशमेषां न चिन्तय़ेत् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखेन परमेणेदमुदरं पातितं मय़ा ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखेन महता युक्ता मानसेन मनस्विनी ||
५ ग
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखेन महता राजा सन्तप्तो भरतर्षभ |
५० क
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
दुःखेन महताविष्टः स्वकृतेनानिवर्तिना |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
दुःखेन महताविष्टस्ततः सुष्वाप पक्षिहा ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
दुःखेन महताविष्टो निःश्वसन्पन्नगो यथा ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
दुःखेन महताविष्टो नोवाचाप्रिय़मण्वपि ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
दुःखेन महताविष्टो युधिष्ठिरमपृच्छत ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
दुःखेन महताविष्टो विललापातिकर्शितः ||
३५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वासुदेव उवाच
दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थौ प्रपद्यते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थौ प्रपद्यते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
दुःखेन लभते दुःखं द्वावनर्थौ प्रपद्यते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
दुःखेन श्लेष्यते भिन्नं श्लिष्टं दुःखेन भिद्यते |
८१ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
दुःखेन सुखमन्विच्छेत्स राजवसतिं वसेत् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखेनाभिपरीतानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
दुःखेनासाद्यते पात्रं धार्यतामेष ते सुहृत् ||
६५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखेनैतत्समानीतं स्थविरो नाशय़त्यसौ |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः |
५६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखैर्वहुविधैर्धीमानरण्ये विदितं तव ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
दुःखोपघाते शारीरे मानसे वाप्युपस्थिते |
११ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखोपहतचित्ताभिः समन्तादनुनादितम् |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
दुःखोपहतविज्ञाना धैर्यमुत्सृज्य भारत ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
दुःखोपाय़स्य मे वीर विकाङ्क्षा परिवर्तते |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
दुःखोपेता रोगिणो नित्यमेव; न वुध्यन्ते धनभोगान्न सौख्यम् ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
दुःशलश्चित्रसेनश्च कुण्डभेदी विविंशतिः ||
६८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशला चापि तान्योधान्निवार्य महतो रणात् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशला वालमादाय़ नप्तारं प्रय़यौ तदा |
२२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
दुःशलां मानय़द्भिस्तु यदा मुक्तो जय़द्रथः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशलां समय़े राजा सिन्धुराजाय़ भारत |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
युधिष्ठिर उवाच
दुःशलामभिसंस्मृत्य गान्धारीं च यशस्विनीम् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२५६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशलाय़ाः कृते राजा यत्तदाहेति कौरव ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशलाय़ाश्च तं पौत्रं वालकं पार्थिवर्षभ |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासन इदं वाक्यमव्रवीत्कुरुसंसदि ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
दुःशासन तथा क्षिप्रं सर्वमेवोपपादय़ ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासन निवोधेदं वचनं मम भारत ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
दुःशासन रथाः सर्वे कस्मादेते प्रविद्रुताः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
दुःशासन रथास्तूर्णं युज्यन्तां भीष्मरक्षिणः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
दुःशासन रथास्तूर्णं युज्यन्तां भीष्मरक्षिणः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासन सुवालोऽय़ं विकर्णः प्राज्ञवादिकः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
दुःशासनं च कर्णं च शकुनिं चापि सौवलम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनं च कर्णं च शकुनिं चाभ्यभाषत ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
दुःशासनं च कर्णं च सर्वानेव च भारतान् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
दुःशासनं च निहतं मन्ये शोचति पुत्रकः ||
८६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनं च विंशत्या विव्याध शिनिपुङ्गवः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनं ततः क्रुद्धः पीडय़ामास पाण्डवः |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनं तु शैनेय़ो नवैर्नवभिराशुगैः |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४३
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनं तु समरे प्रतिविन्ध्यो महारथः |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
दुःशासनं त्रिभिर्वाणैरभ्यविध्यत्स्तनान्तरे ||
२५ ख