द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
सर्वार्थसाधकं पुण्यं सर्वकिल्विषनाशनम् |
१०२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
सर्वार्थसिद्धिं लभते शुकं प्राप्य यथा द्रुमः ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
सर्वार्थानां व्याकरणाद्वैय़ाकरण उच्यते |
३६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
सर्वार्थान्विपरीतांश्च वुद्धिः सा पार्थ तामसी ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
सर्वार्थेषु रथी रक्ष्यस्त्वं चापि भृशपीडितः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
सर्वावस्थं त्वमप्येषां द्विजातीनां प्रिय़ं कुरु |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
सर्वावस्थं मनुष्येण न्याय़ेनान्नमुपार्जितम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
सर्वावस्थं व्राह्मणस्वापहारो; दाराश्चैषां दूरतो वर्जनीय़ाः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
सर्वावासं वासुदेवं क्षेत्रज्ञं विद्धि तत्त्वतः ||
१७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सर्वावासः सर्वचारी दुर्वासा वासवोऽमरः |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सर्वावासी श्रिय़ावासी उपदेशकरो हरः ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
सर्वाश्च गर्भानलभंस्ततस्ताः पार्थिवाङ्गनाः ||
५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
सर्वाश्चर्यमय़ं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
सर्वाश्चान्या देवताः प्रीय़माणा; हविस्तुभ्यं प्रतिगृह्णन्तु राजन् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाश्चापस्त्वमेवेति त्वत्तो वय़मधीमहे ||
३० ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वाश्चाभ्यभवत्कृष्णा रूपेण यशसा श्रिय़ा ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
सर्वाश्चास्य क्रिय़ाश्चक्रे विधिदृष्टेन कर्मणा ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
सर्वाश्चेज्याः सर्वलोकक्रिय़ाश्च; सद्यः सर्वे चाश्रमस्था न वै स्युः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
सर्वाश्चैव क्रिय़ास्तस्य पर्यहीय़न्त भूपते ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
सर्वाश्चैव प्रजा नित्यं राजा धर्मेण पालय़ेत् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
सर्वाश्रमपदे ह्याहुर्गार्हस्थ्यं दीप्तनिर्णय़म् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
युधिष्ठिर उवाच
सर्वाश्रमेषु मूढेषु कर्मसूपहतेषु च |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सर्वाशय़ो दर्भशाय़ी सर्वेषां प्राणिनां पतिः |
१०५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
सर्वासां देवतानां च धारय़त्यवपुर्वपुः ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वासां या तु मातॄणां नारी क्रोधसमुद्भवा |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वासां सरितां चैव समुद्भेदो विशां पते |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वासामेव नारीणां चित्तप्रमथनोऽभवत् ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वासामेव वेदाहं कर्म चैव कृताकृतम् ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
सर्वास्तस्य समुत्पन्ना देवराज्ञो महात्मनः ||
३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वास्ताः कौरवो राजा सम्पूज्यापालय़द्घृणी ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
सर्वास्ताः समभित्यज्य निमेषादिव्यवस्थितः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
सर्वास्तु सेना व्यतिसेव्यमानाः; पदातिभिः पावकतैलहस्तैः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
शल्य उवाच
सर्वास्त्रज्ञान्महेष्वासान्सर्वानेव महारथान् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वास्त्रपारगं द्रोणं कथं मृत्युरुपेय़िवान् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
सर्वास्त्रप्रतिघाताय़ विहितं पद्मय़ोनिना ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वास्त्रविदनाधृष्य अभेद्यकवचावृतः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वास्त्रविदनाधृष्यो देवगन्धर्वराक्षसैः ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
सर्वास्त्रविदमेय़ात्मा वारय़ामास फाल्गुनिः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
सर्वास्त्रविदुषः सर्वे महात्मानो मता मम ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
सर्वास्त्रविदुषां लोके श्रेष्ठस्त्वमसि विश्रुतः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वास्त्रविदुषोर्घोरं वृत्रवासवय़ोरिव ||
९६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
सर्वास्त्रविद्भवान्हन्याद्दिव्यैरस्त्रैर्न संशय़ः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
सर्वास्त्रविनय़ोपेतं दान्तं शान्तं मनस्विनम् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वास्त्राणां प्रय़ोगं च तेऽभिजानन्ति कृत्स्नशः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वास्त्रेषु परं वीरः प्रकर्षमगमद्वली ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वास्त्रेषु स निष्णातः पार्थिवेष्वितरेषु च |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वास्त्वद्याभिगच्छन्तु स्कन्दं लोकस्य मातरः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२
वलदेव उवाच
सर्वास्ववस्थासु च ते न कौट्या; द्ग्रस्तो हि सोऽर्थो वलमाश्रितैस्तैः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सर्वास्ववस्थासु हितावर्जुनस्य मनोनुगौ |
८२ क