वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
दुर्धर्षां तर्कय़ामास दीप्तामग्निशिखामिव ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
यातुधान्यु उवाच
दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
यातुधान्यु उवाच
दुर्धार्यमेतन्मनसा गच्छावतर पद्मिनीम् ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्निरीक्ष्यो हि भूतानां तेजसाभ्यधिकं वभौ |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
दुर्निवारतमा चैव प्रभग्ना महती चमूः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
दुर्निवार्यतमा चैव प्रभग्ना महती चमूः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्नीतं वा सुनीतं वा तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
देवय़ान्यु उवाच
दुर्भगाय़ा मम द्वौ तु पुत्रौ तात व्रवीमि ते ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
दुर्भाषिणो मन्युवशानुगस्य; कामात्मनो दुर्हृदो भावनस्य ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
दुर्भिक्षमाविशेद्राष्ट्रं यदि राजा न पालय़ेत् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
दुर्भिक्षादेव दुर्भिक्षं क्लेशात्क्लेशं भय़ाद्भय़म् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्भ्रातुस्तस्य चोग्रस्य तथा दुःशासनस्य च ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
दुर्मदस्तु ततो यानं दुष्कर्णस्यावपुप्लुवे ||
२९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
दुर्मदस्य च वीरस्य दुष्कर्णस्य च तं रथम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
दुर्मदस्य ततो भीमः प्रहसन्निव संय़ुगे |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मदो दुष्प्रगाहश्च विवित्सुर्विकटः समः |
५ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मना दीनमनसं वसुदेवमुवाच ह ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मना विमुखश्चैव परिचक्राम तां सभाम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मनुष्या हि निर्वेदमफलं सर्वघातिनम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मन्त्रितमिदं तात राज्ञो दुर्द्यूतदेविनः |
१६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
दुर्मरं पुनरप्राप्ते काले भवति केनचित् |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मरं पुरुषेणेह मन्ये ह्यध्वन्यनागते |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मरं प्राणिनां वीर काले प्राप्ते कथञ्चन ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
दुर्मरं वत मन्येऽहं नृणां कृच्छ्रेऽपि वर्तताम् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मरं वत वार्ष्णेय़ कालेऽप्राप्ते नृभिः सदा |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणं च राजेन्द्र आवन्त्यौ च महारथौ ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणं च विंशत्या चित्रसेनं च पञ्चभिः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणं द्वादशभिश्चतुर्भिश्च विविंशतिम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणं पाण्डवं भीमवेगं; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
दुर्मर्षणं हतं श्रुत्वा वृषसेनं च संय़ुगे |
८८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणश्च विंशत्या चित्रसेनश्च पञ्चभिः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणश्च विंशत्या पाण्डवं निशितैः शरैः ||
६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मर्षणस्य भवनं दुःशासनगृहाद्वरम् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणो दुःसहश्च चित्रसेनश्च दुर्मुखः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणो दुःसहश्च दुर्मदो दुर्धरो जय़ः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०८
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणो दुर्विषहो दुर्जय़श्च महारथः |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणो द्वादशभिर्दुःसहो दशभिः शरैः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणो महाराज जैत्रो भूरिवलो रविः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणो विकर्णश्च सिन्धुराजश्च वीर्यवान् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
दुर्मुखं प्रमुखे कृत्वा सततं चित्रय़ोधिनम् |
८७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
दुर्मुखं प्रेक्ष्य सङ्ग्रामे सूतपुत्रपदानुगम् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
दुर्मुखः कृतवर्मा च कृपः शल्यो विविंशतिः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
दुर्मुखः श्रुतकर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
दुर्मुखः समरे प्राय़ाद्भीष्महेतोः पराक्रमी ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
दुर्मुखः सहदेवं तु प्रत्युद्याय़ महावलम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
दुर्मुखश्च द्वादशभी राजन्विव्याध सात्यकिम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
दुर्मुखस्तु महेष्वासो वीरं पुरुजितं वली |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
दुर्मुखस्य च वेश्माग्र्यं श्रीमत्कनकभूषितम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
दुर्मुखस्य तु भल्लेन छित्त्वा केतुं महावलः |
२२ क