आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याहं कीर्तय़िष्यामि शन्तनोरमितान्गुणान् ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८
शल्य उवाच
तस्याहं कुरुशार्दूल प्रतीपमहितं वचः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
तस्याहं तपसो वीर्यं जानमानस्तपोधन |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
उशनो उवाच
तस्याहं ते प्रवक्ष्यामि विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
तस्याहं ते भवने भूरितेजसो; राजन्निमं हस्तिनं यातय़िष्ये ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
अर्जुन उवाच
तस्याहं निग्रहं मन्ये वाय़ोरिव सुदुष्करम् ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
तस्याहं निशितं भल्लं प्राहिण्वं भरतर्षभ |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
तस्याहं पदवीं यास्ये सन्देशात्तव मानद |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तस्याहं परिमाणं तु न सङ्ख्यातुमिहोत्सहे |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
तस्याहं प्रमुखे वाणान्न मुञ्चेय़ं कथञ्चन ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याहं वदतः सूत वहुशो मम संनिधौ |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
तस्याहं सदृशान्दारान्राजेन्द्र समुदावहम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्याहं सर्वमेवैतं भवतो व्यसनागमम् |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तस्याहमभवं पुत्रो धौम्यश्चापि ममानुजः ||
७५ ग
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्याहमवशो वक्त्रं दैवय़ोगात्प्रवेशितः ||
९१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
तस्याहमसुरघ्नस्य कांश्चिद्भगवतो गुणान् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
तस्याहमात्मजो व्रह्मा सर्वस्य जगतः पतिः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
तस्याहमीप्सितं वुद्ध्वा कालीं मातरमावहम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
तस्याहमेक एवासं पुत्रः पुत्रवतां वरः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
तस्याय़ं च परश्चैव लोकः स्यात्सफलो नृप |
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
तस्याय़ं वचनाद्दष्टो न कोपेन न काम्यया |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
९७
लोमश उवाच
तस्याय़माश्रमो राजन्रमणीय़ो गुणैर्युतः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
तस्याय़सं निशितं तीक्ष्णधार; मसिं विकोशं गुरुभारसाहम् |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
तस्याय़सं वर्मवरं वररत्नविभूषितम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
तस्याय़सीं महाशक्तिं चिक्षेपाथ पितामहः |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
तस्याय़े च व्यये चैव समाश्वसिहि मा शुचः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
३५
सूत उवाच
तस्येदं मानसं शल्यं समुद्धर्तुं त्वमर्हसि |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
तस्येदानीं फलं कृत्स्नमवाप्नुहि नरोत्तम ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
तस्येदानीं विकारोऽय़मधर्मो यत्कृतो महान् ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
तस्येन्द्रः सहितो देवैः साक्षात्त्रिभुवनेश्वरः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्येन्द्रजिदसम्भ्रान्तः प्रासेनोरसि वीर्यवान् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
तस्येन्द्रसमवीर्यस्य सङ्ग्रामेष्वनिवर्तिनः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
७५
शुक्र उवाच
तस्येश्वरोऽस्मि यदि ते देवय़ानी प्रसाद्यताम् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
तस्येषवः प्राणहराः सुमुक्ता; नासज्जन्वै वर्मसु रुक्मपुङ्खाः |
६३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२
सञ्जय़ उवाच
तस्येषुधाराः शतशः प्रादुरासञ्शरासनात् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
तस्येषुधी धनुर्ज्यां च वाणैः संनतपर्वभिः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
तस्येषुभिर्व्यधमत्कर्णपुत्रो; महारणे चर्म सहस्रतारम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तस्येषूनिषुभिश्छित्त्वा द्रोणो विव्याध तावुभौ |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्येह यजमानस्य यज्ञे यज्ञे पुरोहितः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
तस्येय़ं फलनिर्वृत्तिः सृगालत्वं मम द्विज ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
तस्येय़ं फलनिर्वृत्तिर्यदापन्नास्मि मूढवत् ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तस्येय़ं वसुसम्पूर्णा वसुधा वसुधाधिप |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यै गर्भं समावेद्य तत्रैवान्तरधीय़त ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
यक्षा ऊचुः
तस्यै निमित्ते कस्मिंश्चित्प्रादात्पुरुषलक्षणम् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४
सूत उवाच
तस्यै भर्ता वरं प्रादादध्यर्धं पुत्रमीप्सितम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यै स प्रददौ मन्त्रमापद्धर्मान्ववेक्षय़ा |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
तस्यैकत्वं महत्त्वं हि स चैकः पुरुषः स्मृतः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यैकैव कुले कन्या रूपतो लोकविश्रुता ||
१२ ख