chevron_left  साध्याarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
साध्या देवा महाप्राज्ञं पर्यपृच्छन्त वै पुरा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
साध्या देवा वसवश्चाश्विनौ च; रुद्राश्च विश्वे मरुतां गणाश्च |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
साध्या देवा वय़मस्मो महर्षे; दृष्ट्वा भवन्तं न शक्नुमोऽनुमातुम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१
देवस्थान उवाच
साध्या राजर्षिसङ्घाश्च धर्ममेतं समाश्रिताः |
१९ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
साध्या रुद्रास्तथादित्या ये चान्येऽपि दिवौकसः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
साध्या विश्वेऽथ मरुतो ज्योतींषि सुमहान्ति च |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
साध्या विश्वेऽथ मरुतो वसवः पितरस्तथा ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
साध्याः प्राचीं सगन्धर्वा वसवो दक्षिणां दिशम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय २६
सूत उवाच
साध्यानां मरुतां चैव ये चान्ये देवतागणाः |
२९ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
साध्यानामथ देवानां वसूनां मरुतामपि |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
साध्यानामपि देवानां देवदेवेश्वरः प्रभुः |
२ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
साध्यानामपि देवानां वसूनामीश्वरेश्वरः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
भीष्म उवाच
साध्यानामिह संवादं हंसस्य च युधिष्ठिर ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
साध्याश्च सर्वे मरुतस्तथैव; यमं पुरस्कृत्य धनेश्वरं च ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
वसिष्ठ उवाच
साध्याश्च सर्वे सन्त्रस्ता दैतेय़स्य पराक्रमात् ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
साध्यासाध्यं कथं शक्यं सदाचारो ह्यलक्षणम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
साध्वत्र रम्यतामिति ||
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
साध्वन्यमनुपश्य त्वमुपाय़ं प्राणधारणे |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
साध्वपत्यं तस्योत्पादय़ेति ||
५९ ग
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
साध्ववतर वापीसलिलमिति ||
२७ क
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
साध्वसं तत्प्रनष्टं मे किं करोमि व्रवीहि मे ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
ऐल उवाच
साध्वसाधून्धारय़तीह भूमिः; साध्वसाधूंस्तापय़तीह सूर्यः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
ऐल उवाच
साध्वसाधून्वातय़तीह वाय़ु; रापस्तथा साध्वसाधून्वहन्ति ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
साध्वस्यामपत्यमुत्पाद्यतामिति ||
७० ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
साध्वहं ज्ञापितो देवा युष्माभिर्भद्रमस्तु वः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
साध्वागम्यतां तावदिति ||
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
साध्वाचारतय़ा केचित्तथैवौपय़िका अपि |
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
साध्वाचारप्रवृत्तानां चातुराश्रम्यकर्मणाम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १९७
मार्कण्डेय़ उवाच
साध्वाचारा शुचिर्दक्षा कुटुम्वस्य हितैषिणी |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
साध्वाचाराः स्त्रिय़ो व्रह्मन्यत्कुर्वन्ति सदादृताः |
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
महेश्वर उवाच
साध्वि सुभ्रु सुकेशान्ते हिमवत्पर्वतात्मजे ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
साध्विदं कथ्यते वीरा यदेवं मतिरद्य वः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
साध्विदं राज्यमद्यास्तु पाण्डवैरभिरक्षितम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
साध्विमं लव्धवाँल्लाभं योऽहं दिव्यास्त्रधारिणम् |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
साध्विमौ मातुलं युद्धे क्षत्रधर्मपुरस्कृतौ |
२० क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
साध्वीः पत्नीर्द्विजेन्द्राणामकामाः कामय़ाम्यहम् ||
४५ ख
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
साध्वीगुणसमाधानैर्भूषितं ते कुलद्वय़म् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
साधय़ामस्तावदित्युक्त्वा प्रातिष्ठतोत्तङ्कस्ते कुण्डले गृहीत्वा ||
१३५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५१
वैशम्पाय़न उवाच
साधय़ित्वा तदात्मानं तस्याः स गतिमन्वय़ात् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
गण्डो उवाच
साधय़ित्वा स्वय़ं प्राशेद्दास्ये जीवतु चैव ह |
७३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
महेश्वर उवाच
साधय़ित्वात्मनात्मानं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः |
५० क
सभा पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
साधय़िष्याम तं राजन्वय़ं त्रय़ इवाग्नय़ः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २७८
नारद उवाच
साधय़िष्यामहे तावत्सर्वेषां भद्रमस्तु वः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
साधय़िष्यामहे तावदित्युक्त्वान्तरधीय़त ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
सूर्य उवाच
साधय़िष्यामि सुश्रोणि पुत्रं वै जनय़िष्यसि |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
साधय़े भविता चैतद्यत्त्वय़ाहमिहार्थिता ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
सञ्जय़ उवाच
सानुकर्षपताकैश्च द्विपाश्वरथभूषणैः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
सानुकर्षाः सतूणीराः सवरूथाः सतोमराः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८२
भृगुरु उवाच
सानुक्रोशश्च भूतेषु तद्द्विजातिषु लक्षणम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
सानुक्रोशा जितक्रोधाः पुरुषाः स्वर्गगामिनः ||
१०० ख