आदि पर्व
अध्याय
७३
देवय़ान्यु उवाच
तस्य शुक्रस्य कन्याहं स मां नूनं न वुध्यते ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
तस्य शुक्रस्य निष्पन्दात्पांसून्सङ्गृह्य भूमितः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
तस्य शुद्धात्मनः प्रादात्स्कन्धे भरतसत्तम ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
तस्य शुश्रूषणे यत्नमकरोद्गालवो मुनिः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
तस्य शैलस्य चाग्रं वै यन्त्रेणेन्द्रोऽभ्यपीडय़त् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
तस्य शैलस्य पार्श्वेषु सर्वेषु जय़तां वर |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य शैलस्य शिखरात्क्षीरधारा नरेश्वर |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
८७
धौम्य उवाच
तस्य शैलस्य शिखरे सरस्तत्र च धीमतः |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
तस्य शोणितदिग्धस्य सलिलेन समुक्षितम् |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
तस्य शोणितदिग्धाङ्गाः शोणास्ते वातरंहसः |
१० क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
तस्य शोणितसन्दिग्धान्केशानुन्नाम्य पाणिना |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
तस्य शौचममृष्यन्तः सर्वे ते सहजातय़ः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
तस्य श्रान्तस्य शुष्केण कण्ठेन क्रोशतस्तदा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य संनिहितो नाम शव्दरूपस्य साधनः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२२
स्त्र्यु उवाच
तस्य संमाननार्थं मे त्वय़ि वाक्यं प्रभाषितम् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
कश्यप उवाच
तस्य संवत्सरे पूर्णे पाश एकः प्रमुच्यते |
६८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य संस्मय़तः शौरेर्विद्युद्रूपा महात्मनः |
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य सङ्कल्पमाज्ञाय़ भीमं प्रत्यशुभं हरिः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
तस्य सङ्ग्रहणं राजन्स्वपक्षस्य विवर्धनम् ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तस्य सञ्चरतो राजन्मण्डलावर्तने तदा |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
तस्य सञ्जनय़न्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य सत्यवतः केतुर्भुजगारिरदृश्यत ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
तस्य सत्याभिसन्धस्य सूक्ष्मदानेन चैव ह |
८५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
तस्य सन्दधतश्चेषून्संहितेषुं च कार्मुकम् |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तस्य सन्दधतस्तीक्ष्णाञ्शरांश्चासक्तमस्यतः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
तस्य सन्दृश्य सद्भावमुपविष्टस्य धीमतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
तस्य सप्तसु यज्ञेषु सर्वमासीद्धिरण्मय़म् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य सम्पश्यतस्त्वेव पिनाकी वृषभध्वजः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य सम्राड्गुणार्हस्य भवतः कुरुनन्दन |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
तस्य सर्वं यथावृत्तमाख्यातुमुपचक्रमे |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य सर्वं सविस्तारं पाण्डवानां विचेष्टितम् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य सर्वगुणोपेता विमलाक्षा हय़ोत्तमाः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२७९
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य सर्वमभिप्राय़मितिकर्तव्यतां च ताम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२५
व्राह्मण उवाच
तस्य सर्वस्य विधिवद्विधानमुपदेक्ष्यते |
२ क
वन पर्व
अध्याय
१८५
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य सर्वस्य सम्प्राप्तः कालः परमदारुणः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०९
वर्गो उवाच
तस्य सर्वा वय़ं वीर श्रुत्वा वाक्यमिहागताः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
तस्य सर्वाणि रक्ष्याणि दूरतः परिवर्जय़ेत् |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
तस्य सर्वात्मना मन्ये भारद्वाजस्य रक्षणम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
तस्य सर्वानुपासङ्गान्सर्वोपकरणानि च |
५३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
तस्य सर्वान्हय़ान्हत्वा सञ्छिद्य शतधा रथम् |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
तस्य सर्वाय़सीं शक्तिं शल्यः कनकभूषणाम् |
७२ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
तस्य सर्वे महीपाला धनान्याजह्रुराज्ञय़ा |
५६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
तस्य सर्वे महीपाला वर्तन्ते स्म वशे तदा |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
तस्य सर्वे महीपालाः शासनावनताः स्थिताः ||
५३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्य सर्वे यथान्याय़ं पूजां चक्रुः कुरूद्वहाः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
तस्य सर्षपपुष्पाणां तुल्यवर्णा हय़ोत्तमाः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
तस्य साक्षात्कुण्डधारो दर्शय़ामास भारत |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
तस्य साधुसमाचारादभ्यासाच्चैव वर्धते |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२०१
व्याध उवाच
तस्य साधुसमारम्भाद्वुद्धिर्धर्मेषु जाय़ते ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
गौतम उवाच
तस्य सालोक्यतां यातु विसस्तैन्यं करोति यः ||
६६ ख