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विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
दुष्करं कृतवान्द्रोणो यदर्जुनमय़ोधय़त् ||
५५ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
दुष्करं कृतवान्भीष्मो यदर्जुनमय़ोधय़त् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
दुष्करं परमज्ञानं तर्केणात्र व्यवस्यति |
४८ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
दुष्करं पुष्करं गन्तुं दुष्करं पुष्करे तपः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
दुष्करं पुष्करे दानं वस्तुं चैव सुदुष्करम् ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
धृतराष्ट्र उवाच
दुष्करं प्रतिसन्धानं तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
दुष्करं भवता कर्म रणेऽद्य सुमहत्कृतम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
दुष्करं वत कुर्वन्ति पितरो मातरश्च वै ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
दुष्करं वत कुर्वन्ति महतोऽर्थांस्त्यजन्ति ये |
९ क
वन पर्व
अध्याय २०६
व्राह्मण उवाच
दुष्करं हि कृतं तात जानता जातिमात्मनः ||
९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
दुष्करं हि रसज्ञेन मांसस्य परिवर्जनम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
दुष्करः प्रतिसङ्ख्यातुं तर्केणात्र व्यवस्यति ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
दुष्कर्णं निहतं दृष्ट्वा पञ्च राजन्महारथाः |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
दुष्कर्णं समरे क्रुद्धो विव्याध हृदय़े भृशम् ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
दुष्कृतं चात्मनो मर्षी रुष्यत्येवापमार्ष्टि वै ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
दुष्कृतं तव वा वीर वुद्ध्या हीनं कुरूद्वह ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
दुष्कृतं मम किं नु स्याद्भवतां वा द्विजर्षभाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
दुष्कृतः सुकृतश्चैव तथा शस्त्रहता रणे ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
दुष्कृतस्य क्षय़ं गत्वा ततो जाय़ति मानुषः ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
दुष्कृताय़ां यथान्याय़ं तथाय़ं कर्तुमर्हति ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
श्वपच उवाच
दुष्कृती व्राह्मणं सन्तं यस्त्वामहमुपालभे ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
दुष्कृते सुकृते वापि न जन्तुरय़तो भवेत् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
दुष्टं पन्थानमाश्रित्य यो मोहादभिपद्यते |
७४ क
आदि पर्व
अध्याय १९६
द्रोण उवाच
दुष्टः पाण्डवहेतोस्त्वं दोषं ख्यापय़से हि नः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०८
युधिष्ठिर उवाच
दुष्टस्य च परिज्ञानमदुष्टस्य च लक्षणम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
दुष्टस्य मनसः पञ्च सम्प्रदुष्यन्ति मानसाः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
दुष्टा रुष्टा व्याधिता दुर्वला वा; न दातव्या याश्च मूल्यैरदत्तैः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
शुनःसख उवाच
दुष्टा हिंस्यादिय़ं पापा युष्मान्प्रत्यग्निसम्भवा |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
दुष्टाः स्वदोषैरिति कीर्तय़ित्वा; पुरेषु राष्ट्रेषु च योजय़न्ति ||
४२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
दुष्टात्मा भीममन्वैच्छद्दिधक्षुरिव पावकः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९६
कर्ण उवाच
दुष्टानां चैव वोद्धव्यमदुष्टानां च भाषितम् ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय ११
नकुल उवाच
दुष्टानां प्रतिपत्तिं च कृत्स्नं चैव चिकित्सितम् ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
दुष्टान्नं विषमान्नं च सोऽन्योन्येन विरोधि च |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
युधिष्ठिर उवाच
दुष्टामात्यसहाय़स्य स्रुतमन्त्रस्य सर्वतः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
दुष्टामात्येन वा वीर शरीरपरिपन्थिना ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
दुष्टाय़ा लक्ष्यते लिङ्गं प्रवक्तव्यं प्रकाशितम् ||
६५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
दुष्टे चान्ने नैष मम शापो भविष्यतीति ||
१३४ 5
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
दुष्टेङ्गितं च विविधं वृत्तिश्चैवानुजीविनाम् |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय १९६
कर्ण उवाच
दुष्टेन मनसा यो वै प्रच्छन्नेनान्तरात्मना |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
दुष्टेषु सर्ववर्णेषु व्राह्मणान्प्रति सर्वशः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
दुष्टो मानुषमांसादो महाकाय़ो महावलः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
दुष्प्रज्ञाः केचिदाभान्ति केचिदाभान्ति पण्डिताः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
दुष्प्रज्ञानेन निरय़ा वहवः समुदाहृताः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
उमो उवाच
दुष्प्रज्ञाश्चापरे देव ज्ञानविज्ञानवर्जिताः ||
४३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
दुष्प्रणीतेन मनसा दुष्प्रणीततराकृतिः |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
दुष्प्रणीतेन मे तात मनसाभिप्लुतात्मनः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
दुष्प्रधर्षं ततश्चैव सुजातं च सुतौ तव |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
दुष्प्रधर्षः सुवाहुश्च वातवेगसुवर्चसौ |
८ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
दुष्प्रवेशं महाराज नरैर्धर्मवहिष्कृतैः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३०
मतङ्ग उवाच
दुष्प्रापं खलु विप्रत्वं प्राप्तं दुरनुपालनम् |
११ क