आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
ते श्रमेण च कौरव्यास्तृष्णय़ा च प्रपीडिताः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
ते श्राद्धेनार्च्यमाना वै विमुच्यन्ते ह किल्विषात् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
ते श्रुत्व शर्ववचनमृषय़ः सत्यवादिनः |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
ते श्रुत्वा किं नु वक्ष्यन्ति द्रोणपुत्रास्त्रनिर्जिताः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
ते श्रुत्वा रथनिर्घोषं वारणाः शिखिनस्तथा |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
ते श्रुत्वा वचनं तस्य ततस्तीर्थस्य मानद |
२० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
ते श्रुत्वैव वचस्तस्य पौरजानपदा जनाः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
ते संमन्त्र्य ततो देवा मदस्यास्यगतास्तदा |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
ते संरव्धाः समागम्य द्विसाहस्राः प्रहारिणः |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
ते संविभक्ता मुनिभिर्नूनं देवैः सवासवैः |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
ते संस्मरन्तः सङ्ग्रामे विचरिष्यन्ति कालवत् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
ते सङ्गताः स्थावरजङ्गमेशाः; प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
ते सत्यमाहुः कर्तव्या दय़ास्माभिर्वनौकसाम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
ते सत्यमाहुर्धर्मं च न्याय़्यं च भरतर्षभ ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
ते सदोषा हतास्माभी राज्यस्य परिपन्थिनः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
ते सन्त्यज्य तनूर्याताः शूरा व्रह्मविदां गतिम् ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ते समन्तात्परिवृताः पाण्डवैः पुरुषर्षभाः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ते समन्तान्महाराज परिवार्य युधिष्ठिरम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
ते समन्तान्महावाहुं परिवार्य वृकोदरम् |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
ते समागम्य मुनय़ः सस्मरुर्वै सरस्वतीम् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
ते समाज्ञाय़ सम्प्राप्तं यज्ञिय़ं तुरगोत्तमम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
ते समानीतमात्रे तु शकले पुरुषर्षभ |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
अहल्यो उवाच
ते समानय़ भद्रं ते गुर्वर्थः सुकृतो भवेत् ||
२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
ते समार्छन्नरव्याघ्राः क्षणेन भरतर्षभ |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
ते समाश्वासय़ामासुराशीर्भिश्चाप्यपूजय़न् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
ते समासाद्य कौन्तेय़मावृण्वञ्शरवृष्टिभिः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१३४
वैशम्पाय़न उवाच
ते समासाद्य कौन्तेय़ान्वारणावतका जनाः |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
ते समासाद्य गङ्गां तु शिवां पुण्यजनोचिताम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
ते समासाद्य पन्थानं यथोक्तं वृषपर्वणा |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
ते समासाद्य मां रौद्रा वहुधा मर्मभेदिनः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
भीष्म उवाच
ते समासाद्य वरदं वासवं लोकपूजितम् |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
ते समासाद्य समरे परस्परमरिन्दमाः |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
ते समासाद्य सरितं पुण्यामोघवतीं नृप |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
ते समासाद्य सहिताः सुधर्मामभितः सभाम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
ते समेता महात्मानः कुरुवृष्ण्यन्धकोत्तमाः |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
ते समेता महात्मानः शरीरमिति सञ्ज्ञितम् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८७
वैशम्पाय़न उवाच
ते समेत्य ततः सर्वे कथय़न्ति स्म भारत |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
ते समेत्य तथान्योन्यं संनाहान्विप्रमुच्य च |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
ते समेत्य नरव्याघ्रा भारद्वाजं महारथम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
ते समेत्य महात्मानमन्योन्यमभिसंश्रिताः |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
ते समेत्य यथान्याय़ं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
ते समेत्य यथान्याय़ं पाण्डवा वृष्णिभिः सह |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
ते समेत्य रणे राजञ्शस्त्रप्रासासिधारिणः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
ते समेत्य सुसंरव्धाः सहिताः पुरुषर्षभाः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
ते समेन पथा यात्वा योत्स्यमाना महारथाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
ते सर्व एव राजानमभिजग्मुर्युधिष्ठिरम् |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
ते सर्वतः सम्परिवार्य पार्थ; मस्त्राणि दिव्यानि समाददानाः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
ते सर्वतः सम्परिवार्य सङ्ख्ये; शैनेय़माजघ्नुरनीकसाहाः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
ते सर्वतो विद्रवन्तो योधा वित्रस्तचेतसः |
५ क